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लखीमपुर खीरी किसान आन्दोलन पर आखिरी सच की विस्तृत रिपोर्ट।

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ajay mishra teni maharaj अजय मिश्रा टेनी सांसद लखीमपुर

 

केंद्र की मोदी सरकार में जुलाई में मंत्री बनाए गए अजय मिश्रा पहली बार लखीमपुर खीरी में हुए बवाल के बाद चर्चा में आए हैं। भले ही इस विवाद के बाद देश भर में उनके नाम की चर्चा हुई है, लेकिन लखीमपुर खीरी में वह लंबे समय से एक मजबूत और दबंग नेता माने जाते रहे हैं। जिले में ‘टेनी महाराज’ के नाम से लोकप्रिय अजय मिश्रा कुश्ती के बहुत शौकीन रहे हैं और हर साल दंगल का आयोजन कराते हैं। फिलहाल केंद्रीय गृह राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे अजय मिश्रा इलाके के बड़े कारोबारी भी हैं। राइस मिल, कई पेट्रोल पंप चलाते हैं और बड़े पैमाने पर खेती की जमीन के भी मालिक हैं।

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टेनी महाराज दो बार खीरी लोकसभा सीट से सांसद चुने जा चुके हैं। 2009 में राजनीति में एंट्री करने से पहले वह वकालत के पेशे से जुड़े थे। 1990 के दशक में मिश्रा परिवार कानपुर से लखीमपुर खीरी शिफ्ट हो गया था। फिलहाल यूपी के तराई के इलाके में अजय मिश्रा को दबंग नेताओं में शुमार किया जाता है। यही नहीं 2003 में तिकुनिया नगर पंचायत में एक मर्डर केस में भी उनका नाम आया था। इसके अलावा एक बार सुनवाई के दौरान उन पर कोर्ट में हमला हुआ था और गोली लगने के बाद भी वह बाल-बाल बचे थे।

चुनाव दर चुनाव बढ़ती गई अजय मिश्रा की ताकत।

अजय मिश्रा 2004 में मर्डर केस से बरी हुए तो फिर राजनीति का रुख कर लिया। 2009 में उन्होंने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2012 में बीजेपी से निघासन विधानसभा सीट से उतरे थे। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी की लहर के बाद भी वह जीतने में कामयाब रहे थे। उनकी इस जीत से पार्टी का भरोसा बढ़ा और फिर 2014 में उन्हें लोकसभा का टिकट मिल गया। यहां भी वह सफल रहे और एक लाख से ज्यादा वोटों से उन्हें जीत मिली। यही नहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में तो उनकी जीत का अंतर बढ़ते हुए दोगुना हो गया। इस बार वह 225,000 वोटों से एसपी कैंडिडेट पूर्वी वर्मा के खिलाफ जीत गए।

जितिन प्रसाद की एंट्री के बाद अचानक बढ़ा कद।

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उनकी इस जीत और ब्राह्मण नेता होने के चलते मोदी सरकार में इसी साल जुलाई में उन्हें एंट्री दी गई। वह यूपी से भाजपा की केंद्र सरकार में हिस्सा बनने वाले अकेले ब्राह्मण चेहरे हैं। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि हाल ही में जितिन प्रसाद की एंट्री के चलते उन्हें इतनी तवज्जो मिली। दरअसल जितिन प्रसाद को ब्राह्मण नेता बताया जा रहा था और कहा गया कि ऐसा करके पार्टी अपने ही चेहरों को कमजोर कर रही है। इसके बाद अजय मिश्रा टेनी को मंत्री बनाकर प्रमोट किया गया।

किसानों से विवाद का पूरा मामला।

राष्ट्रवादी शेर
राष्ट्रवादी शेर

रविवार को नए कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन के दौरान बवाल हो गया। किसान संगठनों का आरोप है कि केंद्रीय गृह राज्‍य मंत्री (MoS Home) अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष ने प्रदर्शनकारियों पर गाड़‍ियां चढ़ा दीं। चार किसानों की मौत की खबर है जबकि कई घायल बताए जा रहे हैं। इसके बाद, उग्र किसानों ने आशीष और उसके समर्थकों की गाड़‍ियों में तोड़फोड़ और आगजनी शुरू कर दी।

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अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले इतनी बड़ी घटना पर विपक्ष सक्रिय हो गया है। तमाम किसान संगठनों के नेता समेत कांग्रेस, समाजवादी पार्टी व अन्‍य दलों के शीर्ष नेता लखीमपुर खीरी पहुंचनें का प्रयास किया। हालांकि, सोशल मीडिया पर इस पूरी घटना का एक अलग पहलू चर्चा में है।

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प्रदर्शन में शामिल शख्‍स की टी-शर्ट पर भिंडरावाले की फोटो?
ट्विटर पर कई लोगों ने रविवार के खूनी संघर्ष की एक फोटो शेयर की है। इनमें प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी नजर आ रहे हैं। एक पुलिस अधिकारी किसी से फोन पर बात करता हुआ दिख रहा है। उसके बगल में नीली पगड़ी पहने एक शख्‍स है जिसकी सफेद टी-शर्ट पर जरनैल सिंह भिंडरांवाले की फोटो छपी दिख रही है। कुछ हैंडल्‍स से इस टी-शर्ट के पीछे का हिस्‍सा भी शेयर किया है जिसपर खालिस्‍तान समर्थन में एक स्‍लोगन ल‍िखा है। एक वीडियो भी वायरल हैं जिसमें कुछ लोग खालिस्‍तान के समर्थन में नारेबाजी करते नजर आ रहे हैं।

विज्ञापन द्वारा अजय प्रजापति 7518148156

वायरल तस्‍वीर का सच क्‍या है?
सोशल मीडिया पर वायरल यह फोटो न्‍यूज एजेंसी PTI की ओर से जारी की गई। प्रमुख मीडिया संस्‍थानों ने रविवार की घटना की कवरेज में इस तस्‍वीर को इस्‍तेमाल किया है। तस्‍वीर का बैकग्राउंड, विजिबल क्‍यूज घटनास्‍थल से मेल खाते हैं।

लखीमपुर खीरी में नेताओं का जमघट।
हिंसा में 8 लोगों की मौत के बाद विपक्षी दलों ने योगी आदित्‍यनाथ सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। पूर्व मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को लखीमपुर खीरी जाने से रोका गया तो वह कार्यकर्ताओं संग धरने पर बैठ गए। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की भी पुलिस से तीखी बहस हुई जिसके बाद उन्‍हें हिरासत में ले लिया गया। बीजेपी सांसद वरुण गांधी ने भी किसानों की हत्‍या को ‘अक्षम्‍य’ बताते हुए सीएम से कड़ी कार्रवाई की मांग की।

आशीष मिश्रा उर्फ मोनू बनें पूरे काण्ड के खलनायक।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा लखीमपुर खीरी कांड में खलनायक के तौर पर सामने आ रहे हैं। लखीमपुर में चार किसानों को कुचलने के आरोप में उन पर केस दर्ज हो चुका है। रविवार को हुई हिंसक झड़प में कुल आठ लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें बाकी चार बीजेपी के कार्यकर्ता हैं। हालांकि सांसद पिता अजय मिश्रा ने सफाई देते हुए कहा है कि उनका बेटा घटनास्थल पर नहीं था।
पूरे मामले में आशीष मिश्रा मोनू का नाम सुर्खियों में है। आशीष मिश्रा केंद्रीय मंत्री के छोटे बेटे हैं। साल 2012 में पिता को विधायकी का टिकट मिलने के साथ ही वह राजनीति में ऐक्टिव हो गए थे। साथ ही पिता के पेट्रोल पंप और राइस मिल वगैरह का बिजनस भी देखते थे। आशीष मिश्रा कैसे पिता के छत्रछाया में बीजेपी के बड़े नेताओं के करीब आते गए, यह उनकी फेसबुक अकाउंट को खंगालने पर पता चलता है। उनकी फेसबुक पोस्ट को देखें तो 2018 से पहले आशीष आमतौर पर अपने पिता के काम ही शेयर करते थे। धीरे-धीरे वह न सिर्फ बीजेपी नेताओं के करीब आते चले गए, बल्कि इस विधानसभा चुनाव में टिकट के तगड़े दावेदार के तौर पर भी उभर गए।

Ajay Mishra Son Aashish Mishra

बेटे आशीष मिश्रा (दाएं) के साथ अजय मिश्रा

पिता के चुनाव प्रचार की संभाली जिम्मेदारी।
जिला पंचायत सदस्य के रूप में अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले अजय मिश्र टेनी को 2012 में बीजेपी ने लखीमपुर खीरी की निघासन सीट से टिकट दिया था। उस वक्त उनके चुनाव प्रचार का जिम्मा बेटे आशीष मिश्रा ने संभाला था। दोनों की कड़ी मेहनत और अजय मिश्रा की लोकप्रियता के बदौलत यहां बीजेपी को जीत हासिल हुई थी जबकि सरकार सपा की बनी थी।

आशीष मिश्रा के रूतबे का सफर।

गूगल सर्च

पिता के विधायक बनने के बाद क्षेत्र में आशीष मिश्रा का रुतबा बढ़ता गया। विधायक के रूप में अजय मिश्रा के कामकाज को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया और 2014 में लखीमपुर से सांसदी का टिकट दिया। इस बार भी बेटे आशीष ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली और पिता को लोकसभा पहुंचाने में मदद की।

2017 चुनाव में मांगा था टिकट पर बात नहीं बनी

दो चुनाव में पिता का साथ देकर आशीष भी राजनीति का ककहरा सीख चुके थे। 2017 विधानसभा चुनाव में अजय मिश्रा ने बेटे के लिए टिकट मांगा लेकिन बात नहीं बन पाई। हालांकि आशीष निघासन में लगातार सक्रिय रहे।

फोटो साभार-आशीष मिश्रा मोनू फेसबुक

फोटो साभार-आशीष मिश्रा मोनू फेसबुक

2019 लोकसभा चुनाव में अजय मिश्रा टेनी को एक बार फिर लोकसभा चुनाव का टिकट मिला और उन्होंने जीत दर्ज की। इसी साल जुलाई में हुए मोदी कैबिनेट विस्तार में उन्हें भी जगह दी गई और अजय मिश्रा को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद 2022 के चुनाव में आशीष को निघासन से टिकट दिए जाने की संभावना बढ़ गई।

लगातार निघासन में सक्रिय रहे आशीष मिश्रा।
आशीष मिश्रा की फेसबुक प्रोफाइल को देखें तो वह लगातार अपने क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। निघासन में हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में वह शामिल होते रहे हैं। पिछले दिनों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सरकार की ओर से आयोजित कार्यक्रम में स्मार्ट फोन भी बांटे थे।

विज्ञापन द्वारा मनुवादी पार्टी

आशीष मिश्रा पर क्या है आरोप?
लखीमपुर हिंसा मामले में आशीष मिश्रा के खिलाफ तिकुनिया थाने में एफआईआर दर्ज हुई है। आरोप है कि जिस समय किसान प्रदर्शन कर रहे थे उसी वक्त गाड़ी ने उन्हें रौंद दिया। आशीष मिश्रा पर गाड़ी चलाने का आरोप है। इस दौरान 4 किसानों समेत 8 लोगों की मौत हो गई। केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उनका बेटा घटनास्थल में शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि उनका बेटा कार नहीं चला रहा था। आशीष मिश्रा ने भी अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया।

विज्ञापन द्वारा विनोद ओझा

सांसद अजय कुमार मिश्रा टेनी ने कहा कि हमारे देश में कानून का राज है, एफआईआर लिखाने पर हक सबको है। जबकि उक्त हिंसा से जुड़ा एक बड़ा सबूत सामने आया है। इसमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे नजर आ रहे हैं। दरअसल, काले झंडे दिखा रहे किसानों को कुचलने के बाद थार जीप के कुचलने का एक वीडियो सामने आया था। अब उसी कड़ी में एक दूसरा वीडियो आया है। यह सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक शख्स उतरकर भाग रहा है। जिसे यूजर गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र का बेटा आशीष ‘मोनू’ बता रहे हैं। हालांकि इस वीडियो की पुष्टि आखिरी सच नहीं करता है।

https://twitter.com/BurnwalRoshanKr/status/1445302880726966278?s=19

अजय मिश्र ने किए थे ये दावे-

हिंसा वाले दिन मंत्री अजय मिश्र ने दावा किया था कि उनका बेटा वहां नहीं था। घर पर दंगल का आयोजन कर रहा था। वे खुद डिप्टी CM केशव मौर्य को रिसीव करने जा रहे थे। यदि कोई साबित कर दे तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे।

आशीष की गाड़ी से तीन किसानों की कुचलकर मौत हुई थी। इसके बाद आंदोलित किसानों ने आशीष की जीप को आग के हवाले कर दिया था, जबकि ड्राइवर और तीन भाजपा कार्यकर्ताओं की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

https://twitter.com/ART4bjp/status/1445389553410482176?s=19

केंद्रीय मंत्री के बेटे समेत 14 के खिलाफ हत्या का केस दर्ज।

केंद्रीय मंत्री के बेटे समेत 14 लोगों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा के मामले में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे आशीष मिश्र समेत 14 लोगों पर हत्या और आपराधिक साजिश का केस दर्ज किया गया है। यह केस बहराइच के नानपारा के रहने वाले जगजीत सिंह की शिकायत पर तिकुनिया थाने में दर्ज हुआ है।

दूसरी तरफ मंत्री अजय मिश्र के ड्राइवर की शिकायत पर तिकुनिया थाने में ही अज्ञात किसानों पर हत्या, जानलेवा हमला और मारपीट की धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

सरकार ने मृतकों के परिवार को 45 लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया है। वहीं सभी मृतकों के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी। साथ ही घटना की न्यायिक जांच और 8 दिन में आरोपियों को गिरफ्तार करने का वादा भी किया गया है।

एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार नें जीता किसानों का विश्वाष।

लखीमपुर हिंसा की उठती लपटों पर पूरे देश की निगाहें थीं लेकिन 24 घंटे से भी कम समय में सब कुछ शांत हो गया। आखिर ये सब कैसे हुआ? कौन इसका सूत्रधार बना? किसानों के गुस्से को भांपते हुए किसने राकेश टिकैत को मनाया। जवाब है- यूपी के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार। प्रशांत कुमार पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने भरोसा जताया और फ्री हैंड देकर उन्हें लखीमपुर रवाना किया। प्रशांत ने रणनीतिक रुप से सिर्फ राकेश टिकैत को ही लखीमपुर आने की अनुमति दी। राजनीतिक पार्टी के नेताओं को वहां नहीं जाने दिया गया।

टिकैत के पहुंचते ही प्रशांत ने उन्हें भरोसे में लिया। सरकार की नीयत बताई और उनकी तमाम मांगे एक ही झटके में मान ली। टिकैत को अपने साथ प्रेस कांफ्रेंस में बैठाया। एक आईपीएस होने के बावजूद केंद्रीय गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा व उनके बेटे के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिलाया। कहा- मंत्री के बेटे के खिलाफ एफआईआर होगी। कड़ी कार्रवाई होगी। मृतकों के लिए मुआवजे से लेकर नौकरी तक का भरोसा दिलाया।

लखीमपुर में रहकर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर नजर रखी।

प्रदेश के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने प्रशासनिक अधिकारियों संग करीब 14 घंटे की मशक्कत के बाद समान्य कर दिया। उन्होंने लखीमपुर में मौजूद रहकर पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था पर नजर रखते हुए कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं होने दी। हालांकि, कांग्रेस, सपा, बसपा समेत गैर भाजपा राजनैतिक दलों ने लखनऊ से लेकर पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन किए थे।

एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार लखीमपुर हिंसा के बाद कांफ्रेंस करते हुए।
एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार लखीमपुर हिंसा के बाद कांफ्रेंस करते हुए।

सुपर कॉप की भूमिका में दिखे एडीजी।
रविवार को घटना की जानकारी होते ही लखनऊ से एडीजी प्रशांत कुमार ने लखीमपुर का रुख किया। सीएम गोरखपुर में थे। पूरे घटना क्रम की पल-पल की जानकारी दिल्ली से भी मांगी जा रही थी। समूचा विपक्ष एजुट होकर सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख इख्तियार कर चुका था। ऐसी परिस्थितियों में बिगड़े हालात की कमान संभालने जब प्रशांत कुमार लखीमपुर पहुंचे तो किसानों से बात करने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। उन्होंने मृतक किसान के परिजनों से सहानुभूति पूर्वक बातचीत करके घटना की निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाया। वहीं किसान यूनियन के नेताओं से लगातार संपर्क में रहकर शांति की अपील करते रहे। नजीता यह रहा कि प्रदेश में कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं हुई और कोई भी राजनैतिक दल इसको बड़ा मुद्दा नहीं बना सका।
किसान नेता टिकैत को चंद घंटे में सरकार की नीतियों से अवगत कराया
एडीजी प्रशांत कुमार घटना स्थल का मुआयना करने के बाद से ही किसान नेता राकेश टिकैत के संपर्क में आ गए थे। उन्होंने टिकैत के सामने मृतक किसानों का हित देखते हुए मुआवजे से लेकर सरकारी नौकरी तक की हर बात को कुशलता से रखा। करीब चार घंटे चली मैराथन मीटिंग में सरकार का पक्ष रखा और टिकैत के साथ साझा प्रेस कांफ्रेंस की। मीडिया को बताया कि किसानों की हर मांग मान ली गई है। इस दौरान अपर मुख्य सचिव कृषि देवेश चतुर्वेदी, डीजी एसएन साबत, आईजी लखनऊ जोन लक्ष्मी सिंह आदि की भी अहम भूमिका रही, लेकिन फ्रंट फेस प्रशांत का ही रहा।

https://twitter.com/anuj_hanumat/status/1445019588341624836?s=19

वेस्ट यूपी का कनेक्शन काम आया
1990 बैच के आईपीएस प्रशांत कुमार को मई 2020 में एडीजी लॉ एंड ऑर्डर बनाया गया। मेरठ जोन में तैनाती के दौरान एडीजी प्रशांत कुमार कांवरियों पर हैलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा और मेरठ जोन में सबसे ज्यादा एनकाउंटर के चलते सुर्खियों में आए। वहां रहते हुए टिकैत और अन्य नेताओं से उनके पुराने संबंध भी इस समझौते में कारगर साबित हुए।

किसानों से टकराईं जब भी सरकारें, उन्हें सत्ता से होना पड़ा बाहर, 2012 में मायावती सरकार को भुगतना पड़ा था खामियाजा।

आगामी विधानसभा चुनाव में अब 6 माह से भी कम का वक्त बचा है। 3 नए कृषि कानूनों के विरोध में पिछले दस माह से यूपी, पंजाब और देश के दूसरे राज्यों में किसान आंदोलन कर रहे हैं। रविवार को लखीमपुर खीरी में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के बेटे ने किसानों पर गाड़ी चढ़ाई, जिसके बाद किसान आंदोलन हिंसक हो उठा।

8 लोगों की मौत के बाद पूरे प्रदेश को अलर्ट कर दिया गया है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन को खत्म करना अब सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सरकारें किसानों से टकराई हैं, तो सरकारों को ही नुकसान उठाना पड़ा है।

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अपनी जंग से पीछे नहीं हट रहा किसान।

पिछले दस माह से अधिक समय से किसान केंद्र सरकार के 3 नये कृषि कानूनों के खिलाफ धरना दे रहे हैं। सर्दी, गर्मी और बारिश में भी ये दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे। कोरोना की दूसरी लहर के बाद भी आंदोलन नहीं खत्म हुआ। 5 सितंबर 2021 को मुजफ्फरनगर में संयुक्त किसान मोर्चे की महापंचायत हो चुकी है, जिसमें देशभर के किसान शामिल हुए।

सरकार की तरफ से जिन नेताओं को किसानों के बीच मध्यस्थता की जिम्मेदारी दी गई, वह भी कामयाब नहीं हुए। जानकारों की मानें तो जब-जब बड़े किसान आंदोलन हुए हैं, सरकार और किसानों की सहमति से ही वे खत्म हुए। ऐसे में हिंसक होते इस आंदोलन को लेकर भी केंद्र सरकार को जल्द किसी नतीजे पर पहुंचने की जरूरत है।

मई 2011 में भट्टा परसौल में भी हुई थी हिंसा।

मई 2011 में गौतम बुद्ध नगर जिले के भट्टा पारसौल में भी किसान आंदोलन हिंसक हो उठा था। ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल गांव में जमीन अधिग्रहण के विरोध में 7 मई 2011 को पुलिस और किसानों के बीच टकराव शुरू हो गया। इसमें दो पुलिसकर्मी और 2 किसानों की गोली लगने से मौत हो गई।

लाठीचार्ज व फायरिंग में 50 से अधिक किसान घायल हुए। जिसके बाद किसान आंदोलन उग्र हो गया। उस समय प्रदेश में बसपा की सरकार थी। पूरे प्रदेश में किसान सड़कों पर उतर आए। नतीजा यह हुआ कि 2012 के विधानसभा चुनाव में ही बसपा सत्ता से बाहर हो गई।

पर्यावरणीय ज्ञाप

अगस्त 2010 में अलीगढ़ के टप्पल की हिंसा।

अगस्त 2010 में अलीगढ़ जिले के टप्पल में भी किसान आंदोलन हिंसक हो उठा था। यह विवाद यमुना एक्सप्रेस वे की जमीन अधिग्रहण को लेकर शुरू हुआ था। जिसमें एक सिपाही समेत 5 लोगों की मौत हुई थी। 14 और 15 अगस्त 2010 को जब किसान टप्पल के जीकरपुर गांव में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे, तो पुलिस की सख्ती के बाद टकराव शुरू हो गया। हिंसा के बाद मायावती सरकार को झुकना पड़ा और उसने अधिग्रहण नीति में बदलाव कर मुआवजा राशि बढ़ा दी।

अब लखीमपुर में किसान आंदोलन में हिंसा।

रविवार को लखीमपुर में किसान आंदोलन हिंसक हो उठा, जिसमें 8 लोगों की मौत हो गई। किसान आंदोलन अभी तक पंजाब और दिल्ली की सीमाओं और वेस्ट यूपी के जिलों में चल रहा था। लेकिन, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा ने किसानों को सुधारने का जो बयान दिया, उससे नाराज होकर रविवार को हजारों की संख्या में किसान सड़कों पर उतर आए। इस दौरान केंद्रीय मंत्री के बेटे ने धरना दे रहे किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी। आक्रोशित किसानों ने आगजनी शुरू कर दी।

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