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सरकार द्वारा न्यूज चैनल्स की रेटिंग जारी करने वाले हाल ही के फैसले को लेकर डॉ. अनुराग बत्रा ने उठाए ये बड़े सवाल।

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DrAnnuragBatra

आज लोहड़ी है और यह काफी शुभ दिन है। इस शुभ दिन पर सरकार ने टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था ‘ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल’ (BARC) को तत्काल प्रभाव से न्यूज व्युअरशिप डेटा जारी करने का निर्देश दिया है। BARC की साइट और होमपेज पर लिखा गया है, पारदर्शी, सटीक, समावेशी, टीवी दर्शकों की माप प्रणाली (transparent, accurate, inclusive, TV audience measurement system)।

16 दिसंबर को सरकारी अधिकारियों के साथ एक बैठक में BARC के सीईओ नकुल चोपड़ा ने मंत्रालय से एजेंसी को और समय देने पर विचार करने के लिए कहा था। उनका कहना था कि BARC अपने सभी हितधारकों (stakeholders) को बोर्ड में लाना चाहती है और न्यूज रेटिंग्स को फिर से शुरू करने के लिए 10 सप्ताह का समय चाहिए। सवाल यह उठता है कि सरकार ने उस अनुरोध के बावजूद यह निर्णय क्यों लिया और BARC को जल्द से जल्द टीआरपी फिर से शुरू करने का निर्देश दिया?

BARC के चेयरमैन ‘जी’ के पुनीत गोयनका हैं। BARC के बोर्ड में ‘सोनी‘ के एनपी सिंह, ‘प्रसार भारती‘ के सीईओ शशि शेखर वेम्पती, ‘स्टार और डिज्नी इंडिया‘ के के. माधवन, ‘प्रॉक्टर एंड गैंबल‘ के पूर्व सीएमडी भरत पटेल, ‘गोदरेज‘ के सुनील कटारिया, ‘इंडिया टुडे ग्रुप‘ की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी, ‘मलयाला मनोरमा‘ के जयंत मैथ्यू, ‘Publicis Groupe‘ की अनुप्रिया आचार्य और ‘आईपीजी ब्रैंड्स‘ के शशि सिन्हा के साथ-साथ इंडस्ट्री के दिग्गज नकुल चोपड़ा इसमें सीईओ हैं। उन्होंने सुनील लुल्ला से यह बागडोर संभाली है।

सवाल यह है कि जब BARC ने 16 दिसंबर की बैठक में और समय मांगा था, तो केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने 12 जनवरी को तत्काल प्रभाव से BARC को न्यूज रेटिंग्स को फिर से शुरू करने का निर्देश देने का फैसला कैसे किया? इसके साथ ही मासिक प्रारूप (monthly format) में इस जॉनर के लिए पिछले तीन महीने का डेटा भी जारी करने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही मंत्रालय ने टीआरपी सेवाओं के उपयोग के लिए रिटर्न पाथ डेटा (आरपीडी) क्षमताओं का लाभ उठाने के लिए प्रसार भारती के सीईओ की अध्यक्षता में एक ‘वर्किंग ग्रुप’ (Working Group) भी गठित किया है।

करीब एक साल पूर्व रेटिंग्स को लेकर विवाद उठने के बाद न्यूज जॉनर की रेटिंग्स को निलंबित (suspend) कर दिया गया था। तब से क्या बदल गया है? अब क्या बदलने की जरूरत है? सवाल यह है कि अब न्यूज रेटिंग्स फिर से शुरू करने की जल्दबाजी क्यों? यह किसकी मदद करता है? मोटे तौर पर BARC में पांच हितधारक न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, नॉन-न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, एडवर्टाइजर्स, व्युअर्स और एक तरह से सरकार शामिल है।

भले ही इस जानकारी की पुष्टि नहीं की जा सकती है, लेकिन यह एक ऐसा निर्णय था, जो एक दिन में लिया गया था और ऊपर से निर्देश के तौर पर इसे जल्दी से लागू किया जाना था। क्या यह सरकार द्वारा अगले 30 दिनों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे प्रमुख राज्यों में होने वाले चुनावों के कारण लिया गया राजनीतिक निर्णय है? न्यूज रेटिंग्स को जल्द से जल्द फिर से शुरू करना है या नहीं, इस पर ब्रॉडकास्टर्स के बीच एक अनकही भिन्नता थी। ऐसा लगता है कि रेटिंग्स को वापस पाने का विचार प्रबल हो गया है।

न्यूज चैनल्स पर कंटेंट की गुणवत्ता पिछले एक साल में व्यापक रूप से अपरिवर्तित रही है। यह स्थापित प्रोग्रामिंग फार्मूलों और परीक्षण किए गए साधनों पर जारी थी। हालांकि, कोई भी पूरे विश्वास के साथ कह सकता है कि कंटेंट में तीखापन कम हो गया था। कंटेंट पहले से बेहतर हो गया था, क्योंकि रेटिंग्स का पीछा करना अब एकमात्र उद्देश्य नहीं रह गया था। विज्ञापन की दरें मोटे तौर पर पिछले प्रदर्शन और ब्रैंड की ताकत व ऐतिहासिक डेटा के आधार पर काफी सुरक्षित थीं।

क्या इस नए डेवलपमेंट से न्यूज चैनल्स पहले की तरह एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करेंगे और कंटेंट को अधिक तीखा व अधिक विभाजनकारी बनाएंगे? वास्तव में पूर्व के सूचना एवं प्रसारण मंत्रियों ने न्यूज चैनल्स के लिए टीआरपी या रेटिंग्स न होने की वकालत की है। न्यूज चैनल्स के कंटेंट में सुधार के लिए ‘रामबाण’ के रूप में पूर्व में इसकी वकालत की गई है।

क्या न्यूज चैनल्स पर कंटेंट एंकर्स और प्रवक्ताओं के लिए हंगामेदार, तीखा और अजीब सा होगा? क्या हर तरह से राय का ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दे न्यूज कवरेज पर हावी होंगे?

एक दशक से अधिक समय पहले मेरे साथ बातचीत में बाबा रामदेव ने कहा था कि टीआरपी ‘तत्कालीन राष्ट्र पतन’ (देश का विनाशक) है। ऐसा लगता है कि उनका पूर्वानुमान गलत नहीं था।

प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए खतरे की स्टोरी पिछले चार दिनों में दम तोड़ चुकी है। क्या यह मान लेना उचित है कि स्टोरी प्रसारित होने के दौरान रेटिंग्स निर्धारित की गई। क्या यह स्टोरी कम से कम एक सप्ताह या 10 दिनों में खत्म हो जाती? इसके बजाय उत्तर प्रदेश में विधायकों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) छोड़ने की स्टोरी अब लगभग सभी न्यूज चैनल्स पर प्रसारित की जा रही है। क्या यह पुरानी प्रथा को वापस पाने का एक तरीका है? क्या यह मीडिया को फिर से विभाजित करने और उस पर और अधिक प्रभावी ढंग से शासन करने का एक तरीका है?

दो अन्य बिंदु हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।  पहला सरकारी निर्देश की वैधता है। मैं कहना चाहूंगा कि यह BARC पर एक तरह से बाध्यकारी है। 2006 के ‘ट्राई’ के दिशानिर्देशों के अनुसार और 2008 में लागू और स्वीकृत, रेटिंग एजेंसी या एजेंसियों को सरकार मान्यता देगी और BARC एमआईबी से रेटिंग का लाइसेंस धारक है। हालांकि, BARC इसे चुनौती दे सकता है, और अगर वह ऐसा करता है, तो उसे एमआईबी की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस का जवाब देना होगा। यदि BARC ने ऐसा किया, तो वह दो महीने या उससे भी अधिक समय तक खरीद सकता है लेकिन BARC ऐसा नहीं करना चाहेगा। BARC को मुद्रा और उसके अस्तित्व की चिंता करनी होगी।

हालांकि दूसरी बात यह है कि BARC बोर्ड और सीईओ संभवत: सूचना प्रसारण मंत्रालय के इस आदेश से बहुत खुश होंगे,  क्योंकि BARC का राजस्व और बकाया राशि उसकी चिंता का कारण था।

अब न्यूज रेटिंग्स के वापस आने के साथ ब्रॉडकास्टर्स को पिछले बकाया के साथ-साथ वर्तमान रेटिंग्स के लिए शुल्क का भुगतान करना होगा। BARC इस आदेश से खुश हो सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि उसने सूचना प्रसारण मंत्रालय से आदेश प्राप्त करने के लिए BARC बोर्ड के सदस्यों के प्रभाव का भी इस्तेमाल किया हो। यह स्पष्ट रूप से BARC और सरकार दोनों के लिए फायदे का सौदा है।

अगले 30 दिनों के लिए खासतौर से न्यूज चैनल्स और सामान्य रूप से डिजिटल चैनल्स के लिए राजनीतिक दलों का बजट काफी ज्यादा है, क्या इस कदम से राजनीतिक दलों के नेताओं को न्यूज चैनल्स से बेहतर सौदेबाजी करने में भी मदद मिलेगी?

वास्तव में ये काफी विचारणीय और तीखे सवाल हैं।

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(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं। एवं श्री बालाजी पवनतनय सेवा समिति ट्रस्ट समसपुर हलोर रायबरेली के अध्यक्ष भी हैं।)


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