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सांड़ों का दर्द, जो बना सामाजिक पतन का कारण, समस्या के निवारण में, मैकाले शिक्षा बाधक।

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मैं सांड़ हूं, लोग कहते हैं कि मैं उनकी फसल उजाड़ रहा हूँ, सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ, मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया, मे तो हजारों वर्षों से तुम्हारे पूर्वजों की सेवा करता आया हू, क्या मैं कुछ गलत बोल रहा हूँ, मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया?

अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे,चारा देते थे, परिवार के सदस्य की भांति हम एक दूसरे के सुख दुख के पूरक थे, लेकिन समय नें करवट ली, इसाईयत नियोजित शिक्षा प्राप्त कर आज का मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया है, खेती के लिये ट्रैक्टर ले आया, पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा, और मुझे खुला छोड़ दिया, मैं कहाँ और क्यूँ जाता? कहाँ चरता, कहां खाता? मनुष्य ने जंगलों व चरागाहों पर कब्जा कर लिया, अब पापी पेट का सवाल है, अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया। उसका कारण तथाकथित शाषन व संविधान के नाम पर पश्चिमी देशों के लिये हमारा माँस अब सरकारी मशीनरियों को फ्री य बहुत अल्प लागत में मिलनें लगा है।

यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया, मैं फिर भी चुप रहा, चलो किसी काम तो आया तुम्हारे। मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया। इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया, लेकिन अभियान के नाम पर केवल धन उगाही करके तथाकथित स्वघोषित जिम्मेदारों नें अपना व अपनों का केवल पेट भरा, चारे के नाम पर लिया गया पैसा, उनके स्वयं के चारे का माध्यम बना, लेकिन जब मैं अपना पेट भरने गलती से उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे, शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता, इसीलिए अब हमें धडल्ले से काटा जा रहा है, जबकि देश के बुनियाद से लेकर दिल्ली तक अमूमन तथाकथित हिन्दुओं का शाषन भी है।

मित्र बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा, थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा, रहट से पानी निकाल दूंगा, गाड़ी से सामान ढो़ दूंगा, बस मुझे अपना लो
लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा? शायद नही कारण तुम लोग लार्ड मैकाले शिक्षा के प्रभाव व पाश्चात्य सभ्यता के प्रताप से इतना अधिक सभ्य हो गये हो कि तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो, जिन्होंने तुम्हें पालपोष कर यहां तक पहुंचाया, जब तुम उनके नही हुए तो फिर मेरी क्या औकात..??

उपरोक्त दर्द समाज को समाप्ति की ओर अग्रसर करता है, यदि समय रहते हम अपना सुधार करनें को तैयार नही होते तो यह मैकाले शिक्षा पद्धति हमारे समाज को ग्लोबलाइजेशन के नाम पर ट्रेडिंग, पैकिंग, व करों का ये संजालिक आयातित व्यवस्था 3% खास/ 30% दलालों द्वारा 67% गरीब, मध्यम व मजदूर वर्ग के शोषण करके केन्द्रीकृत व्यवस्था को मजबूत करता है।


यदि आप चाहते हैं कि आखिरी सच परिवार की कलम अविरल ऐसे ही चलती रहे कृपया हमारे संसाधनिक व मानवीय संम्पदा कडी़ को मजबूती देनें के लिये समस्त सनातनियों का मूर्तरूप हमें सशक्त करनें हेतु आर्थिक/ शारीरिक व मानसिक जैसे भी आपसे सम्भव हो सहयोग करें।aakhirisach@postbank

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