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ब्राह्मण परिवार बर्बादी के कारण ब्राह्मण व रिश्तेदार, सन् 1981 से आजतक दर दर की ठोकरें खा रहा परिवार, तीसरी पीढी़ समाप्ति की ओर, 30 बीघे के काश्तकार परिवार को शाम की रोटी की नही है गारण्टी, सभी सक्षम सहयोग करें।

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आखिरी सच परिवार की ओर से ब्राह्मण का ब्राह्मण के द्वारा शुरू हुआ उत्पीड़न व बर्बादी की दास्तां पर एक विस्तृत गाथा, पीड़ित परिवार की कहानी पिड़ित की जुबानी, आखिर कहां गये समाज के ठेकेदार, सामाजिक संगठन, ब्राह्मण मंच, राजनेता, राजनैतिक दल, व सरकार की छद्म गरीब उत्थान की तथाकथित योजनाएं। अब समाज के गरीबों को एक जुट होकर गरीबों के अधिकरों के लिए समेकित संघर्ष की आवश्यकता आ पडी़ है।

कहानी शुरू होती है जिला मैनपुरी तहसील करहल करण से दो किलोमीटर दूर गांव भाली से। हमारे गांव में हर प्रकार के हर जाति के लोग रहते थे, यह जो गांव था, वह मेरे दादाजी के ननिहाल था, हां मेरे दादा जी अपने ननिहाल में ही रहते थे, अपने परिवार के साथ उनके परिवार में दो बेटे थे एक मेरे पिताजी शिवराम दुबे एक मेरे चाचा जी शिव नारायण दुबे।



इस गांव के ब्राह्मणों नें हम लोगों को सताना शुरू किया, हमारे खेतों को काट दिया करते थे, पानी भर दिया करते थे, हमारे खेतों के बगल से ही बंबा गया था, बंबे के पानी से हमारी फसल को बर्बाद करते थे, कभी कभी रात में खेत काट लिया करते थे, इन बातों को लेकर मतभेद होते थे मतभेद इतने हुए कि जो हमारे अन्य ब्राह्मण थे, वह दबंग थे। उनके पास बहुत सारे हथियार थे, बंदूके थीं। उनके घर में राइफल भी थी, उनके घर में 28 फायर की स्टैंड गन थी। हमारा करहल प्लाट था दुकानें की थी और एक दुकान बाजार के अंदर कपड़े की थी बहुत खुशहाल परिवार था। लेकिन एक दिन ऐसा वाक्य हुआ जिन ब्राह्मणों के घर में हथियार थे उन ब्राह्मणों ने मेरे दादाजी को खेत पर जूतों से मारा, मेरे दादाजी ने खाना नहीं खाया उस समय तो कहने लगे कि तुम लड़ाई करने लगोगे लेकिन मेरे पिताजी ने मना किया कि हम लड़ेंगे नहीं तब मेरे दादाजी ने खुलकर उनको बताया कि 4 लोगों ने मिलकर उनको खेत पर जूतों से मारा उस समय मेरी उम्र 7 साल की थी।



हमारे गांव में हमारी 30 बीघा जमीन थी, घर के बगल मैं खेत थे, और कुछ खेत कुछ ज्यादा दूरी उन खेतों में कुछ आम के पेड़ भी थे एक जामुन का भी पेड़ था। हमारे खेत घर के सामने हुआ था। एक गांव में जब घुस आएंगे तो सबसे सामने हमारा घर पड़ेगा सामने घुसते पर पहला घर हमारा था। हर आने जाने वाला व्यक्ति वहां पानी पीता था कुए पर और वहां गुड भी रहता था कि कोई भी व्यक्ति प्यासा है उसको गुड़ के साथ पानी पिलाया जाए। घर के बगल से तालाब था तालाब काफी बड़ा था। जिस समय हमारे दादा जी को जूतों से मारा गया था 4 लोगों के द्वारा वह लोग भी ब्राह्मण समाज के थे हमारे खेतों में बहुत अच्छी फसल होती थी लेकिन जब यह घटना घटी तो हमारे दादा जी ने कहा हम इस गांव में अब नहीं रहेंगे।



परिवार की सूझ बूझ का नायाब उदाहरण

तो कुछ ही दूरी पर एक यादवों का गांव था उस गांव में रहते तो उस्मान यादव उनको इस घटना से अवगत कराया तो उन्होंने कहा कि दुबे जी आप गांव क्यों छोड़ कर जा रहे हो आप हमें बता दीजिए एक ही रात में पूरे परिवार को खत्म करवा देंगे लेकिन आप गांव छोड़ कर मत जाइए हमारे दादा जी ने कहा अगर वह मरे तो हम मरे और हम मरे तो मरे ही। उस जमाने में बदमाशों का बहुत बोलबाला था 28 बदमाश रात को हथियार सहित घर पर आए, जब उनको इस घटना के बारे में जानकारी हुई तो कहा पंडित जी एक आदेश करो पूरे परिवार को मौत की नींद सुला देंगे, लेकिन दादाजी ने मना किया नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए।



परिवार के पलायन की पृष्ठभूमि

आगरा में हमारे पिताजी के मामा जी रहते थे, जो नगर महापालिका में चुंगी पर कार्यरत थे, उन्होंने कहा कि आप सब कुछ बेच कर आगरा जाइए और हम आपके नौकरी लगवा देंगे और आपको मकान दिलवा देंगे अच्छा सा, दादा जी वैसे भी सांस से पीड़ित थे जो हमारा प्लॉट था वह दादाजी के इलाज के दौरान बिक गया, उस समय आगरा से इलाज चलता था, उनका इलाज के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गए उसके बाद ऊपर कई सारी घटना घटी लास्ट में सब कुल मिलाकर खेत मकान दुकान सारी संपत्ति करीब ₹ 130000 में बेची गयी।



आगरा के लिए परिवार का गांव से पलायन

सन 1981 में जब परिवार आगरा आयि तो ₹130000 मौजूद थे उसमें से ₹29500 में एक मकान खरीदा बाकी पैसा उन्होंने जॉइंट खाते के नाम से बैंक में रखा अपना नाम डाला मेरे पिताजी के मामा जी ने और मेरे पिताजी का भी नाम डलवाया नहीं मामा जी के नाम से पिताजी के नाम से उन्होंने एक अकाउंट खुलवाया।



जब रक्षक ही बन गया भक्षक

एक नया व्यक्ति जब गांव से शहर में जाता है तो जाते-जाते उसको कोई रोजगार तो नहीं मिलता है कुछ दिन बैठ कर खाता है बैठे-बैठे मैं भी कुछ करीब 10-15 ₹20000 हम लोग करीब ₹20000 बैठ कर खा गए गए होंगे काफी बड़े पैसे की बेईमानी करी उन्होंने मेरे पिताजी के मामा जी ने करीब ₹ 80000 की बेईमानी करी यह घटना करीब सन 1982 की है हमारे पैसे से हमारे मकान को गिरवी रखवाया गया, ₹2000 पर एक दिन जब मैं उनके घर कुछ पैसा मांगने गया तो कहने लगे यहां क्या कोई बैंक खुली है।



परिवार की बर्बादी का नया दौर एक बार और शुरु दानें दानें को मोहताज हुआ परिवार।

उसके बाद से हमारी बर्बादी का आलम शुरू हुआ एक एक पैसे के लिए मोहताज थे हमारे घर में कुछ भी खाने के लिए नहीं था उस समय भी हम परिवार में 7 सदस्य थे हमारे चाचा जी शिव नारायण दुबे हमारे पिताजी शिवराम दुबे मेरी माताजी सरोज दुबे मैं और मेरी तीन बहन जानवरों के गले में पहनने वाली लोहे की चैन होती है जिसको माला कहा जाता है चेन बनाते थे हम लोग घर लाते थे बनाते थे ₹5 का काम कर दिया तो ₹5 ले आए उनसे ₹2 की सब्जी ले आए एक ₹2 का आटा ले आए चीनी पत्ती भी लाए दूध भी लाए। इस तरीके से जीवन यापन करते थे कभी कभी वह काम भी नहीं मिलता था रोजगार भी उस समय नहीं था इतना रात के 12:12 बज जाते थे हम लोग और चैन बनाते बनाते ही, सब्जी नहीं रहती तो आटा में नमक डालकर हम लोग नमक की रोटी खाते थे, कभी कभी रोटी सब्जी भी नहीं थी तो बाजार से किसी चाय वाले की दुकान से चाय ले आते थे वह चलाते थे उनको उधार लाकर खा लेते थे, मुहल्ले में रहने वाले लोग सब्जी का कारोबार करते थे सब्जी बेचते थे तो कभी छोड़ दिया करते थे, उनको काट काट के हम लोग सड़े सड़े निकाल देते थे, व काट काट के उबालकर के खा लिया करते थे, कभी कभी बहुत मद्दे का जमाना था, उस समय में करीब चीनी ₹5 किलो आती थी आटा करीब ₹2 किलो आता था हमारे पैसे से हमारा मकान गिरवी रखा गय पैसा हमारा और हमारे मकान के 2000 पर उस मकान के लिए नोटिस आते थे, और हमारे पिताजी के मामा ने ही उसी मकान को ₹2000 पर दूसरे का बताकर गिरवी रखा मकान के दस्तावेज अपने पास में दाब कर रखे रहे।



एक दिन उस नोटिस किसके हस्ताक्षर हम लोगों ने देखें हमारे पिताजी का माथा ठनका इस बात को लेकर विवाद, हुआ उनसे विवाद में हाथापाई हुई कई सालों तक बोलचाल बंद रहे जितना पैसा खाया था उस पैसे के लिए उसने अपने 5 बच्चों की कसम खाई वह व्यक्ति बेईमान था, अईयाश प्रकार का व्यक्ति था दूसरा उसका कारोबार था वह लड़कियों को भी बेचा करता था, कई औरतों की तो उसने बेईमानी कर ली उसकी जब पहली औरत मर गई तो 17 साल की नई औरत को भी ले लाया अपने घर में मेरे पिताजी के मामा के पास तीन बेटे और दो बेटियां थी।



उत्पीड़न का एक और तरीका निकाला रिश्तेदार नें

हमारे मकान पर बिजली का बिल 1,42,000 का वह बिल इतना बड़ा कैसे हो गया एक समय हमारे पिताजी ₹ 800 का बिजली का बिल भरने का है तो बिजली घर वालों ने कहा इतना पैसा दे दो तो इतने रुपए का बिल बना देंगे इतना पैसा दे दो तो इतने रुपए का बिल बना देंगे ₹ 800 का बिल था तो ₹ 800 लेकर गए तो उन्होंने 1400 ₹ का बिल हाथ में थमा दिया। फिर हमारे पिताजी ने बिजली का बिल भरना ही बंद कर दिया।



बेटियों की शादी जैसे तैसे की परिवार नें

मेरी तीन बहन थीं दो बहनों कीशादी छिबरामऊ के पास गांव गुलिया हुई सन 1998 की 23 जनवरी को जबकि सबसे छोटी बहन की शादी इटावा से बेवर रोड पर सरसई नावर हुई।

परिवार की गरीबी बनी शैक्षणिक विकास में बाधा।

आर्थिक गरीबी के कारण हम चारों भाई बहन शिक्षा से वंचित रहे खाने पीने से वंचित रहे, बताया नहीं कि रोटी है तो सब्जी नहीं है, सब्जी है तो रोटी नहीं है और कभी-कभी कुछ नहीं अपने नसीब को कोसते थे, और रोते थे हम लोग अब भगवान को याद करते थे, मुझे पुराना वाला मकान था सुल्तानगंज के रामबाग का भगवान टॉकीज के बीच में पड़ता है, कमला नगर के पास ही सुल्तानगंज नाम का एक मोहल्ला था।



विपरीत परिस्थितियों नें नही छोडा़ परिवार का दामन।

जो हमने सुल्तानगंज में जो मकान खरीदा था वह एक मकान एक मुसलमान का था उस मकान के अंदर जब हमने खरीदा था ₹29500 में एक कमरे के अंदर मुसलमान के किसी पीर का स्थान था और हम लोगों को नहीं मालूम था कि इस मकान के एक कमरे की अलमारी मेरे पीर का स्थान है उस पीर के स्थान पर हमारे पिताजी ने हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना करते तब से हमारी उस घर में बर्बादी शुरू हो गई तरह तरह की घटना होने लगी उस मकान के अंदर गड़ा हुआ खजाना दिखाई देता कभी कुछ दिखाई देता आवाज में भी आने लगती कभी-कभी



चाचा जी रह गये अजीवन कुँवारे, आर्थिक विसंगतियों नें परिवार को तोड़ दिया।

मेरे चाचा जी अविवाहित गरीबी के कारण उनकी शादी नहीं हुई सारा पैसा तो उनके मामा ही डकार गए थे बहनों की शादी हुई तो इस तरीके हुई कि लड़के वालों से कुछ कर्जा देना पड़ा बिना दहेज दिए वह शादी हुई बहनों के मेरी शादी हुई तो कोई पैसा नहीं था बिहार से मुझे अपनी शादी करनी पड़ी सन 2002 में एक बच्चा पैदा हुआ बेटा हुआ था वह मर गया सन 2006 में मेरी पत्नी ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया जिसमें एक बेटा था एक बेटी थी कम समय के बच्चे थे आर्थिक गरीबी के कारण उन बच्चों को आइसोलेशन में रखना था, लेकिन गरीबी के कारण बच्चों को आइसोलेशन में नहीं रख पाए बेटा 8 दिन बाद मर गया और बेटी डेढ़ महीने बाद मर गई।



समस्याएं बनीं रही ज्यों की त्यों?

बिजली का बिल ज्यादा होने के कारण बिजली विभाग से अधिक रिकवरी नोटिस आईं, कई और हमारे पास बैनामा भी नहीं था हमारा धोखे से एक बैनामा का कागज मुझे मेरा उस कागज के माध्यम से मैंने एक नकल निकलवाई उस मकान के लिए ग्राहक लगाने शुरू कर दिए बैनामा के बारे में जब हमारे पिताजी ने अपने मामा जी से कहा तो वह कुछ नहीं बोला 17 जनवरी 2009 को मेरे घर बड़ी बेटी पैदा हुई शिवानी उस घर में कुछ ऐसा आलम था कि बच्चे नहीं बचते थे मेरे मार्च 2009 को हमने वह मकान बेच दिया ₹385000 में मकान बेच दिया ₹85000 में से हमने बिजली का बिल मकान का टैक्स पानी का टैक्स यानी सारे बिल जमा कर दिए हमारे पास ₹300000 बचे,₹ 100000 में हमने 126 गज एक प्लॉट लिया भोले मोहम्मदपुर नगला बिहारी नुनिहाई शाहदरा उस मकान को बनाने में ₹200000 खर्च हुए हमने हमारी पत्नी ने बेलदारी कर के इस मकान को बनाया।



काम आते रहे मेहनत करते रहें खाते रहे, मगर एक पैसा नहीं बचा पाते बेरोजगारी ज्यादा थी जून 2013 को हम किसी काम से ससुराल गए थे यानी बिहार गए थे और मेरी मम्मी कहीं बहन के यहां गई थी मेरे पिताजी और चाचा जी घर पर रह गए थे। चाचा जी ने खाना बनाया था, और पिताजी हमारे छत पर थे रात का समय था पिताजी तो खाना खाकर ऊपर चले गए थे, और चाचा जी नीचे मेरे कमरे में खाना खा रहे थे, खाना खाते समय पता नहीं क्या घटना घटी के उनके दिमाग की नस फट गई या नहीं उनको पैरालाइसिस का अटैक पड़ गया। मैं ससुराल में था मुझे खबर लगी तो मैं ससुराल से कुछ पैसे लाकर उनका इलाज करवाया आर्थिक गरीबी के कारण कुछ कर्जा लेना पड़ा इलाज के दौरान का सिटी स्कैन करवाया हमने, हमारे चाचा एसएन मेडिकल हॉस्पिटल में करीब भर्ती रहे वह डॉक्टरों ने कहा कि एम आर आई करवाओ आर्थिक तंगी के कारण मेरी पत्नी के घरवालों की आर्थिक स्थिति सही नहीं थी मेरी पत्नी भी बीमार थी उस समय एक ही समय में 2 लोग बीमार से घर के अंदर एक साथ दो लोगों का इलाज होना असंभव था दिन में वह मेहनत करता हूं रात को ऐसे ही बिना भोजन के हॉस्पिटल में रुकना पड़ता। आर्थिक तंगी के कारण मैंने अपने चाचा जी का डिस्चार्ज करवा लिया क्योंकि पैसा ही नहीं था तो हम क्या इलाज करवाते।



परिवार की एक और परीक्षा की घड़ी।

जब चाचा जी को डिस्चार्ज करवा दिया, एक दिन ऐसी घटना घटी कि मेरा एक रोड एक्सीडेंट हो गया मेरे हाथ में फैक्चर हो गया था, अब आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई कि मेरे पास अपने इलाज के लिए पैसा नहीं था, मेरे हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था 1 अगस्त 2013 को मेरे चाचा जी ने अंतिम सांस ले अपने शरीर को त्याग दिया, जो 2013 के जो मेरे हाथ में प्लास्टर चढ़ा था उसके भी दस्तावेज है मेरे पास कुछ टूटे हुए हाथ को लेकर बड़े बड़े अधिकारियों के कार्यालय के चक्कर काटे मैंने कहीं भी कोई सुनवाई नहीं हुई जो उप जिलाधिकारी महोदय हैं एत्मादपुर तहसील वहां पर भी मैं गया बीपीएल राशन कार्ड की लिमिट के लिए भी मैंने गुहार लगाई अपने लिए 4 महीने तक मेरे हाथ पर प्लास्टर चढ़ा रहा, मेरे घर के अंदर एक भी पैसा नहीं था यहां तक कि उनके क्रिया कर्म के लिए भी पैसे नहीं थे पड़ोस में रहने वाले लोगों से कर्ज के कर्जे पर पैसा लिया कुछ ₹5000 करीब उसमें उनका क्रिया कर्म किया आगे जाकर एक छोटी सी तेरहवीं मूवी कर्जा कर्जा लेकर कि हम लोगों ने क्योंकि मेरे हाथों प्लास्टर चढ़ा हुआ था चाचा जी को अग्नि भी नहीं दे पाया उनको अग्नि मेरे पिताजी ने दी उनके व अपने इलाज के लिए सरकार से गुहार लगाई, वह साक्ष्य मैंने आपको पेश किए हैं आप उनको देख सकते हो बेहतर तरीके से इसमें मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार अखिलेश यादव को पत्र भेजे गए थे, आगरा के जिला अधिकारी को पत्र भेजे गए थे, उसमें यूनिवर्सिटी की संधि हुई थी जो बैजनाथपुर तहसीलदार की इन्वेस्टिगेशन है उसमें आप उसको पढ़ सकते हो देख भी सकते हैं।



वर्तमान पारीवारिक कुनबा

मेरी तीन बेटी है, बड़ी बेटी का नाम शिवानी 13 साल की है, छोटी बेटी रोशनी 7 साल की है, सबसे छोटी बेटी ज्योति 4 साल की मई के महीने में होगी। आर्थिक गरीबी को लेकर मेरी बड़ी बेटी शिवानी ने तीन पत्र एक प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए, एक पत्र पीएमओ इंडिया के लिए एक पत्र उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए 11 अक्टूबर 2021 को भेजे गए थे।

परिवार की आर्थिक स्थिति

आज मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी भी नहीं है, जो कि मैं अपने बच्चों के लिए नए कपड़े ला कर दे सकू, मैं जिन लोगों के घरों में मजदूरी करता हूं, उनके घर से कपड़े मांग कर पुराने कपड़े लाकर अपने बच्चों को पहनाता हूँ और मैं खुद भी लोगों के उतरे हुए कपड़े पहनता हूं, इस समय जो कपड़े में पहना हूं वह लोगों की उतारे हुए ही कपड़े हैं। तीन बेटियों को लेकर मन बहुत चिंतित रहता है कैसे अपनी बेटियों की शादी करूंगा मैं कैसे मैं उनको शिक्षा दूं कैसे मैं उन का भरण पोषण करूं क्योंकि मैं अकेला कमाने वाला हूं कभी-कभी मन करता है कि मैं आत्महत्या कर लूं क्योंकि मेरे आगे परिवार है कभी सोचता हूं कि 1000000 का इंश्योरेंस करवा दूं अपना के फिर किसी ट्रक के आगे कूद जाऊं इससे करीब मेरे परिवार को 1000000 रुपए तो मिल जाएंगे जिससे मेरी पत्नी मेरी बेटियों की देखभाल हो जाएगी हां उनका जीवन कुछ कट जाएगा।


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आखिरी सच परिवार की अपील

कृपया इस परिवार से बेहतर स्थिति वाला परिवार की आर्थिक मदद करे।खाता धारक का नामः सुखदेव प्रसाद
बैंक का नामः भारतीय स्टेट बैंक
शाखा का नामः भोले मोहम्मदपुर नगला बिहारी नुनिहाई शाहदरा आगरा।
खाता संख्याः 34521209351
आईएफेससी कोडः SBIN0018659 सहयोग करनें वाले बंधु आखिरी सच की सहायता डेस्क नम्बर पर अपनें किये गये सहयोग के साक्ष्य को भेजें 8960364678 सभी सक्षम से सहयोग अपेक्षित है।



यदि आप चाहते हैं कि आखिरी सच परिवार की कलम अविरल ऐसे ही चलती रहे कृपया हमारे संसाधनिक व मानवीय संम्पदा कडी़ को मजबूती देनें के लिये समस्त सनातनियों का मूर्तरूप हमें सशक्त करनें हेतु आर्थिक/ शारीरिक व मानसिक जैसे भी आपसे सम्भव हो सहयोग करें।aakhirisach@postbank

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