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अंतर्राष्ट्रीय गौरेया दिवस पर सवाल, घर गौरैयों से घिरा था, ये घर गौरैया के बिना है, हम क्यों व कहाँ आ गये?

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20 मार्च विश्व गौरैया दिवस विशेष, चिंतन करनें का विषय है, गौरेया चिड़िया, लेकिन दुःख व चिंतन का विषय हो गया है कि पशु पक्षी भी मानवीय आकाँक्षाओं के कारण विलुप्त होनें के कागार पर हैं। यह कटु सत्य व यथार्थ है।

आपने अपने आसपास कितनी गौरैया देखी हैं? यह वह सवाल है जिसे स्वयं से ही पूछा जा सकता है। क्योंकि अब शहरों में गौरैया नहीं दिखती और न ही हाई राइजिंग इमारतों में बने फ्लैटों में घरौंदे दिखते हैं। अगर इस खूबसूरत पक्षी को बचाना है, तो अपने घरों में घरौंदे बनाएं, पानी का पात्र और दाना रखें, क्या पता आसमां से फुदकती हुई गौरैया आपके आंगन या छत पर आ ही जाए।

आज से 25 से 30 वर्ष पीछे जब हम देखतें हैं तो हमारी सुबह की शुरूआत गौरेया के आँगन में आकर फुदकनें से होकर शाम में रैन बसेरे के लिये झुण्डों में उड़ते विभिन्न पक्षियों के दल के कलरव से होता था, लेकिन अत्याधुनिकता की अंधी गली में हम ऐसा खोये कि अपनें नैतिक, प्राकृतिक, सामाजिक मूल्यों से पूर्णतया विमुक्त होकर स्वार्थों के इतने बड़े गुलाम हो गये हैं कि कैप्टिलज्म के चक्कर में यूटिलाइजेशन को भूल चुकें हैं, जिसका खामियाजा हमें तो अभी कम भुगतना पड़ रहा है, जबकि हमारी आनें वाली पीढ़ियों को और भी ज्यादा भूगतना पड़ेगा।

गौरेया चिड़िया की घटती संख्या में खेती मे कीटनाशक दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडियेशन, जंगलो की अंधाधुंध कटाई, व मनुष्य की असंवेदनशीलता ही गौरैया चिड़िया की घटती आबादी का मुख्य कारण है। आखिरी बार अपने घर में गौरेया चिड़िया कब देखी थी पता नहीं, हम गौरेया चिड़िय़ा को बचाएं अधिक से अधिक पेड़ लगाएं पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन करें।

शहरों में वैसे भी गौरैया की संख्या में गिरावट आई है, जिसकी वजह घरों के डिजाइन में आए बदलाव एवं किचन व गार्डन जैसे जगहों की कमी है। जिस कारण गौरैया की चहचहाहट अब कानों में नहीं पड़ती है। ऐसे में देश को ‘गौरैया संरक्षण’ के लिए मुहिम चलाने की जरूरत है। अपने आसपास कंटीली झाड़ियां, छोटे पौधे और जंगली घास लगाने की जरूरत है। फ्लैटों में बोगन बेलिया की झाड़ियां लगाई जाएं ताकि वहां गौरैया का वास हो सके।

लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत है कि हम सिर्फ एक दिन जब गौरैया दिवस आता है, तभी चेतते हैं और गौरैया की सुध लेते हैं, न ही हम पर्यावरण बचाने की दिशा में अग्रसर होते हैं और न ही ऐसे पक्षियों को, जिनका विकास मानव विकास के साथ ही माना जाता है। गौरैया पक्षी का विकास भी मानव विकास के साथ माना जाता है। यह पक्षी इंसानी आबादी के आसपास ही रहती है, लेकिन  बदलते परिवेश और शहरीकरण ने इस पक्षी को इंसानी आबादी से दूर कर दिया है। यही वजह है कि देश की राजधानी दिल्ली में गौरैया राज्य पक्षी घोषित किया गया है, ताकि इसका संरक्षण हो सके और मनुष्य की इस प्राचीनतम साथी को बचाया जा सके। मुझे अब भी याद है कि कैसे बचपन में गौरैया हमारे आसपास ही मंडराती थी। चहचहाहती थी। फुदक कर आ जाती थी। यह एक ऐसा पक्षी है, जो इंसानों के करीब रहना पसंद करता है और डरता भी नहीं है। पहाड़ी घरों के चाक और गोठ में गौरैया का वास होता था। बचपन से ही हमनें इस पक्षी को अपने सबसे ज्यादा करीब पाया और अपने आसपास ही चहकते हुए देखा था। लेकिन, अब दूर-दूर तक नजर दौड़ाने पर भी गौरैया नहीं दिखती है।

हमारे आसपास गौरैया यानी घरेलू चिड़िया की चहचहाहट की गूंज कम सुनाई देने लगी है। इसकी एक वजह है घरेलू चिड़िया के सिमट रहे प्राकृतिक आवास। ऐसे में विलुप्त हो रही गौरैया को बचाने के लिए सेव स्पैरो फाउंडेशन आगे आया। इसके प्रयासों ने न केवल गौरैया की आबादी बढ़ी, बल्कि घर के अंदर ही चहचहाहट बढ़ गई है।

फाउंडेशन ने ऐसे घोंसले तैयार किए, जिन्हें गौरैया ने अपना आशियाना बनाने के लिए चुना। यह सब संभव हुआ तोशाम के राहुल बंसल की बदौलत। उसने सेव स्पैरो फाउंडेशन का गठन कर अब तक देशभर में करीब 70 हजार चिड़ियों के घोंसले बांट दिए। फाउंडेशन अब हर छह माह के दौरान करीब 25 से 30 हजार घोंसले बांटकर चिड़िया की आबादी बढ़ाने में जुटा है। हरियाणा के भिवानी जिले के तोशाम निवासी राहुल बंसल इनकम टैक्स और जीएसटी के सलाहकार हैं। उन्होंने पांच वर्ष पहले सेव स्पैरो फाउंडेशन की स्थापना की थी। उनका मकसद अपने आसपास गौरैया की आबादी बढ़ाना था। उन्होंने चिड़िया के घोंसले बनाने के लिए कई प्रयोग किए।

शुरूआत में सफल नहीं हुए। बाद में उसने बिना केमिकल युक्त रंगों और प्लायवुड से घोंसला तैयार किया, जो कुछ समय बाद गौरैया को बहुत पसंद आया और उसमें उसकी आबादी फलने-फूलने लगी। ये घोंसले घर के किसी भी हिस्से में आसानी से लगाए जा सकते हैं।

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हानिकारक कीड़ों से दिलाती है निजात, किसानों की भी है मित्र

राहुल बंसल बताते हैं कि उनके साथ अमृत अग्रवाल, यश, लक्ष्य, नंदिनी, काव्यांश, नरेंद्र गोयल भी इसी मुहिम में जुड़े हैं। हमारा प्रयास रहता है कि गौरैया को अपने आसपास ही आवास मुहैया कराया जाए। गौरैया हानिकरक कीड़ों को खाती है। इसलिए यह किसान की भी मित्र है। गौरैया का पर्यावरण पर भी सीधा असर पड़ता है। यह ऐसा पक्षी है, जो मनुष्य यानी मानव आबादी के साथ ही रहना पसंद करती है। इसलिए यह हमारे घरों में ही अपना छोटा सा आशियाना बनाने की तलाश में रहती है।

ऐसे लगाएं अपने घरों के अंदर गौरैया के घोेंसले

घोंसले को कम से कम सात से आठ फूट ऊंचाई पर लगाएं। छायादार स्थान व बारिश से बचाव के स्थान पर लगाएं। बंदरों व बिल्ली से बचाव के लिए छज्जों के नीचे की जगह व बालकनी उपयुक्त है। घोंसलों के अंदर खाने-पीने के लिए कुछ नहीं डालें।दाना व पानी की व्यवस्था घोंसलों से कम से कम आठ से 10 फुट दूर ही रखें।

घोंसलों के ऊपर किसी भी तरह का अलग से पेंट न करें। घोंसलों की आपस में दूरी कम से कम तीन फूट रहे। घोंसलों में किसी भी तरह की घास फूस न डालें। एक बार लगाने के बाद घोंसलों से छेड़छाड़ न करें।घोंसलों को छत के पंखों से दूर लगाएं।

ये भी ध्यान रखें कि रात के समय इनके घोंसलों के आसपास तेज लाइट न जलाएं। जब इनके अंडे देने का समय हो (मार्च से सितंबर) तब इनके 8-10 फुट दूर सूखी घास डाल सकते हैं। घोंसलों को लगते समय यह भी ध्यान रखे कि इनके ऊपर गर्मियों में दोपहर व शाम की धूप सीधी न पड़े।

सालों पहले ऐसे ही किसी रोज गौरैया को याद करते हुए एक कविता एक प्रकृति प्रेमी के भीतर से फूटी थी।

 

धैली पर आ जाती थी गौरैया
चाक में चहचहाहती
आंगन में फुदकती
गगरी के ऊपर बैठ जाती थी। अमरूद से लेकर नींबू के पेड़ तक बच्चों को दौड़ाती रहती थी गौरैया…

पर हाथ न लगती
पास बैठ जाती,
पकड़ने दौड़ो तो फिर उड़ जाती थी गौरैया।
कभी खिड़की-कभी दरवाजे
कभी ओखली
तो कभी गोठ तक में फुदक आती थी गौरेया, पर अब नहीं दिखती गौरैया।
न पास बैठती
न बालकनी में आती
न पार्क में दिखती
और न ही पेड़ों पर नजर आती।
वो घर गौरैया से घिरा था,
ये घर गौरैया के बिना है।

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