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काशी काहे पूजते मोदी, काशी कैसे पूजेंगे सनातनी, मोदी हैं तो मुमकिन है, काशी व बाबा दरबार के सच को दिखाती आखिरी सच की व्यवस्था को चुनौतीपूर्ण रिपोर्ट।

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आखिरी सच वांट
आखिरी सच वांट

काशी मे विकास के नाम पर हुए मंदिरो के क्रूरतापूर्ण विध्वंसीकरण को प्रकाश सामाजिक संचार माध्यम ट्वीटर पर लाने का यह प्रयास एक  है। इस थ्रेड मे हम मुख्यतया इन बिंदुओं पर प्रमाण सहित विचार करेंगे यथा –

(१) सनातन वैदिक वांग्मय मे काशी का महत्व क्या है?

(२) मंदिरों और विग्रहों के प्राणप्रतिष्ठा के संबंध मे शास्त्रीय पक्ष (मर्यादा) क्या है?

(३) परियोजना से पूर्व मंदिरों ओर विग्रहों की स्थिति क्या थी ओर अब क्या है?

(४) पतितपावनी माँ गङ्गा के अर्धचंद्राकार स्वरूप मे किस प्रकार की विकृति ला दी गई है?

(५) हम सनातनियों की मांग क्या है?

नोट – जिस भी व्यक्ति (अथवा संस्थान) को लगता है की हमारे द्वारा प्रकाश मे लाए गए बिन्दु भ्रामक तथा तथ्यविहीन है। उनसे हमारी प्रार्थना है की फिर वो मर्यादित भाषा मे उन सभी मंदिरों और विग्रहों का वीडियो तथा फोटो प्रमाण के साथ ट्विटर पर साझा करे और सभी लोगों को ये दिखाएं की सभी मंदिर ओर विग्रह पूर्व के समान ही सुरक्षित हैं। तथा उनकी पूजा, अर्चना, सेवा शास्त्रीय मर्यादानुसार हो रही है। यदि आप प्रमाण के साथ ये सत्यापित कर देंगे तो हम इस थ्रेड को मिटा देंगे ओर आगे कभी भी इस विषय पर चर्चा नहीं करेंगे।

पहला प्रश्न ये है सनातन वैदिक वांग्मय मे काशी का महत्व क्या है?

उत्तर: काशी को यदि हम सनातन और सनतानियों के श्रद्धा, भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य का केन्द्रबिन्दु कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। काशी ज्ञान की पुरी है और गङ्गा ब्रह्मद्रवी हैं, ये काशी का अध्यात्मसूत्र है। शास्त्रों का वचन है कि काशी मे स्वयंभू भगवान विश्वनाथ द्वारा मुक्ति का व्रत निरंतर चलता है। भगवान् शंकर जीवों का कल्याण करने के लिए काशी में देहत्याग करने वाले पुरुषों के दाहिने कान तथा स्त्रियों के बायें कान में तारकब्रह्म (ॐ, राम) का उपदेश करके मुक्ति देते हैं।

शास्त्रों मे काशी से संबंधित “काश्याम् मरणान् मुक्ति:” इत्यादि इस तरह की अनेकों सूक्तियाँ प्रसिद्ध हैं। यहाँ तक कहा गया है – असारे खलु संसारे सारमेतच्चतुष्टयम् । काशी वास: सतां सङ्गो गङ्गाम्भ: शिवपूजनम् ।।

अर्थ इस असार संसार में चार वस्तुएं सार है।

काशीवास, सत्संग, गङ्गाजल का सेवन और भगवान् शिव का पूजन। श्री काशी को अविमुक्त क्षेत्र इसलिए कहते हैं, क्योंकि भगवान् शंकर इसे छोड़कर कहीं नहीं जाते। आद्य जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य जी ने भी “काशी-पञ्चकम्” में कहा है, “काश्यां हि काशते काशी काशी सर्वप्रकाशिका। सा काशी विदिता येन तेन प्राप्ता हि काशिका।। अर्थात् शरीर को प्रकाशित करने वाली काशी है , इस आध्यात्मिक-काशी (आत्मा) को जिसने जाना, उसने ही काशी को प्राप्त किया। और तो कितना प्रमाण दें भुतभावन महादेव “काशीरहस्य” मे माता पार्वती से काशी की महिमा गाते हुए स्वयं कहते हैं – योगोऽत्र निद्रा कृतभ: प्रचार: स्वेच्छाशनं देवि महानिवेद्यम्। लीलात्मनो देवि पवित्र दानम् जप: प्रजल्पं शयनं प्रणाम:।। अर्थात् = हे देवी! काशी में निद्रा योगनिद्रा है, काशी में चलना योग की खेचरी मुद्रा है, काशी में स्वेच्छा से किया गया भोजन भी नैवेद्य है, अपनी लीला ही पवित्र दान है, बातचीत ही जप है, सोना – बैठना प्रणाम की तरह फलदायी है। काशी का इतना माहात्म्य है की स्कन्द पुराण मे काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग जिसमे काशी के अलौकिक महत्व तथा यहाँ शरीर छोड़कर केवल मनुष्य ही नहीं कुत्ते बिल्ली मच्छर इत्यादि चराचर प्राणी भी उस परमगति को प्राप्त करते हैं, जो बड़े बड़े योगींद्र मुनीन्द्र को भी सुलभ नहीं होती। इस प्रकार नाना शास्त्रों के प्रमाणों से काशी की दिव्यता सिद्ध होती है।

दूसरा प्रश्न ये है की मंदिरों और विग्रहों के प्राणप्रतिष्ठा के संबंध मे शास्त्रीय पक्ष (मर्यादा) क्या है?



उत्तर: प्राणप्रतिष्ठा सनातन वैदिक वांग्मय की एक अनुपम विधा है, जिसमे हम मंत्र बल द्वारा विग्रहों मे देवताओ की प्रतिष्ठा कर के उस विग्रह को चेतन बना देते हैं। धर्मसिंधु, प्राणप्रतिष्ठा महोदधि, प्रतिष्ठामौक्तिकम इत्यादि ग्रंथों में दो प्रकार की प्रतिष्ठा बताई गई है एक चल और दूसरा स्थिर। चल प्रतिष्ठा सामान्यतः हम कर्मकांड पूजन करते समय गौरी गणेश, वरुण, नवग्रह इत्यादि की स्थापना करते हैं तथा पूजन के उपरांत उनका विसर्जन भी कर देते हैं। किन्तु स्थिर प्रतिष्ठा हम किसी मंदिर मे विग्रहों के स्थापना के समय करते हैं, जिसमे वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा सदा के लिए उस विग्रह को जिस देव का विग्रह हो उन्ही के रूप मे मंत्रबल द्वरा उज्जीवित कर दिया जाता है। प्रतिष्ठा के समय ही आगम शास्त्रों द्वारा उस मंदिर और विग्रह का विधि विधान निर्धारित किया जाता है। जिसमे स्नान, वस्त्र, भोग, आरती, शयन सबका निर्धारण पूर्व से ही होता है। तथा काल निर्धारित हो जाने पर उसका अनुगमन शास्त्रोक्त विधा से करना अनिवार्य होता है। मंदिर के गर्भगृह मे जाने की अनुमति भी बस अधिकृत अर्चक को ही होती है।

सबलोग गर्भगृह मे प्रवेश तथा विग्रह का स्पर्श नहीं कर सकते नहीं तो उस मंदिर ओर विग्रह की मर्यादा नष्ट हो जाती है, जिसके बाद उसका शुद्धिकरण कर पुनः प्राणप्रतिष्ठा करना पड़ता है। काशी मे जिन पुराणोक्त मंदिरों को नष्ट किया गया उनमे से कई विग्रह तो भगवान वेदव्यास, महर्षि याज्ञवल्क्य ,एवं अन्य अन्य ऋषि महर्षियों द्वारा स्थापित किए गए थे, जिन्हे नष्ट कर दिया गया क्या कोई भी कीमत दे कर अब उन मंदिरों को हम उस रूप में ला पाएंगे? अगला बिन्दु है कि मंदिरों तथा विग्रहों की स्थिति परियोजना प्रारंभ होने से पूर्व क्या थी तथा वर्तमान मे क्या है?

वैसे तो १४३ विग्रहों को खंडित किया गया वे सभी अत्यंत महत्वपूर्ण थे किंतु उनमें से भी जो पंचायतन मंदिरो का अपना अलौकिक महात्म्य था। जिनमे से पहला मंदिर ” माता अन्नपूर्णा” का था। चैत्रशुक्ल अष्टमी को इनकी १०८ प्रदक्षिणा करने पर संपूर्ण पृथ्वी के प्रदक्षिणा का फल मिलता था। काशी खंड के अध्याय ४ तथा १०० में भवानी का वर्णन है। शिव महापुराण की उमा संहिता के अध्याय ४४ में भी अन्नपूर्णा की महिमा का वर्णन है। नौ गौरी यात्रा में सातवीं गौरी के रूप में भवानी तीर्थ तथा भवानी गौरी का नाम आता है, जो यही थीं। नवदुर्गा यात्रा में अश्विन शुक्ल अष्टमी को आठवीं दुर्गा के रूप में इनका दर्शन होता था (था इसलिए कहा की अब इनका दर्शन कभी नही हो सकेगा क्युकी इनको बर्बरता पूर्ण ढंग से ड्रिल मशीन इत्यादि लगा कर नष्ट कर दिया गया इसका प्रमाण नीचे की चित्र में आप देख सकते हैं) इनका नाम महागौरी भी था इन्हें ही भवानी गौरी भी कहा जाता था।


काशी के पंचक्रोशी यात्रा, विश्वेश्वर अंतरगृही यात्रा, उत्तर मानस यात्रा, दक्षिण मानस यात्रा में इनका दर्शन होता था। अर्चक के समक्ष जो ३ लिङ्ग दिख रहे हैं, उन्हें महाकाल का गण कहा जाता था इनकी प्रतिष्ठा भी अन्नपूर्णा मां के साथ में ही था जैसा कि आप उपरोक्त चित्र में देख सकते हैं।

इनका पुराना स्थान ज्ञानवापी के आग्नेय कोण में पीपल के पास था, किंतु काशी खंड के 53 में अध्याय में यह उल्लिखित है, कि महाकाल नामक शिवगण ने इनकी स्थापना पुनः इस स्थान पर की थी।

यथा – महाकालेश्वरं लिङ्गं महाकालगणार्चितम्। अर्चयित्वा च नत्वा च स्तुत्वा कालभयं कुत:।।

मत्स्य पुराण में भी इनका उल्लेख मिलता है इस प्रकार का उत्कृष्टतम महत्व रखने वाले इन लिङ्गो का भी क्रूरतापूर्ण विनाश हो गया चिंतन कर के मन भावुक हो जाता है। पंचायतन मंदिरों में दूसरा मंदिर जोकि “अविमुक्तेश्वर महादेव” नाम से प्रसिद्ध है वो विग्रह अत्यंत अलौकिक था।अविमुक्तेश्वर महादेव शास्त्रों के अनुसार ये विग्रह भगवान विश्वनाथ के विक्रह से भी अत्यंत प्राचीन है। तथा इसे काशी का प्रथम लिंग भी बतलाया गया है। विश्वनाथ मंदिर से आग्नेय कोण में स्थित इस विग्रह का वर्णन काशी खंड के १०, ३३, ३९, ६१, ७३, ९७, तथा १०० वें अध्यायों मे विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है। ३९ वें अध्याय मे अविमुक्तेश्वर के उत्पत्ति के संबंध में ऐसी कथा है, कि जब राजा दिवोदास ने काशी से सभी देवताओं को बाहर कर दिया तब भगवान शिव अपने स्थूल रूप से काशी से बाहर गए किंतु लिङ्ग रूप से यही रह गए इसलिए उनके लिङ्ग का नाम अविमुक्त हो गया “न विमुक्त: अविमुक्त:।”

इनका दर्शन करने वाला सभी कर्मबंधनों से मुक्त हो जाता है यथा – अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं दृष्ट्वा क्षेत्रेविमुक्तिके। विमुक्त एव भवति सर्वस्मात् कर्म बन्धनात्।। इस प्रकार काशी खण्ड मे इस लिङ्ग को काशी का पहला लिङ्ग बताया गया है इसके बाद काशी में अन्य लिङ्ग स्थापित हुए। माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन इनके दर्शन का विशेष महत्व है काशी विश्वेश्वर के द्वारा प्रतिष्ठित और पूजित होने के कारण इस लिङ्ग का माहात्म्य अलौकिक है। इसका पूजन करने वाला यदि काशी से बाहर जाकर भी शरीर का त्याग करता है तो भी उससे काशी में देहत्याग का फल मिलता है।

विश्वेश्वर अंतरगृही यात्रा, षडानन यात्रा, दक्षिण मानस यात्रा, तथा उत्तर मानस यात्रा मे इनका दर्शन होता था। शिव महा पुराण की उमा संहिता के ४४वे अध्याय में तथा लिंग पुराण के ९२वें अध्याय में अविमुक्तेश्वर का नामोल्लेख है। महाभारत के वनपर्व के अध्याय ८४/१८ मे भी इनका वर्णन प्राप्त होता है। जिसमे ये कहा गया है, जो महादेव के इस विग्रह का सेवा करता है वो ब्रह्महत्या जैसे पापों से भी मुक्त हो जाता है। यथा – अविमुक्त समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह। दर्शनाद् देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया।। महादेव के इस अद्भुत विग्रह की भी भी वही दशा हुई जो उपरोक्त विग्रह की हुई थी, छैनी ओर हथोड़े के द्वारा इसको भी निकाला गया तथा निकालने वाले संभवतः यवन ही थे ऐसा काशी वासियों का मत है क्योंकि एक सनातनी संभवतः ये कार्य कभी नहीं कारेगा। वर्तमान मे इस लिङ्ग को कहाँ स्थापित किया गया है इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।



तथा परियोजना के अधिकारी वही राग अलाप रहे हैं, कि सब सुरक्षित है किन्तु वो कहाँ हैं? ये किसी को नहीं पता! स्कन्द पुराण मे ये वर्णन प्राप्त होता है कि सुकर जोकि स्वभाव से ही भूमि खोदने वाला होता है, ऐसा सुकर भी काशी में भूमि को नहीं खोदता इसलिए की संपूर्ण काशी ही लिङ्गमयी है, कि कहीं उस से महादेव का अपमान न हो जाए। जब जड़ सुकर के पास भी इतना विवेक है तो फिर मनुष्य हो कर भी जिन लोगो ने सब कुछ जानता हुए भी इस प्रकार के क्रूरतापूर्ण कुकृत्यों को किया उन लोगो से अच्छे तो वो सुकर ही हैं।

यथा – भूदारोपिनभूदारं तथाकुर्याद्यथान्यतः। सर्वालिङ्गमयीकाशीयतस्तत्भीतियन्त्रितः।। – स्कन्द पुराण, काशी खंड ३/२४ पंचायतन मंदिरो का तीसरा विग्रह “माता पार्वती” के रूप में था, माता पार्वती गौरी जी के साथ विघ्नेश्वर विनायक निकुंभेश्वर और वीरभद्र जी भी विराजमान थे। निकुंभेश्वर जी की स्थापना निकुंभ नामक गण ने की है, काशी खंड के अनुसार निकुंभेश्वर की पूजा करके यदि किसी कार्य के लिए जाते हैं। तो वह कार्य अवश्य ही सिद्ध होता है। यथा – निकुम्भेश्वरमालोक्य निकुम्भगणपुजितम्। पूजयित्वा व्रजन ग्रामं कार्यसिद्धिमवाप्नुयात्।। इस मंदिर के साथ भी वही हुआ मंदिर को तोड़ दिया गया तथा विग्रहों का कुछ पता नहीं।

चौथा मंदिर भगवान “लक्ष्मी-नारायण” जी का था काशीखंड के ६१ वे अध्याय में विश्वेश्वर के दक्षिण में विष्णु तीर्थ तथा विश्वेश्वर का स्थान बताया गया है, वहाँ यह कहा गया है, कि विष्णु तीर्थ में स्नान करके जो विष्णु का दर्शन करता है वह विष्णु लोक को प्राप्त होता है।



यथा – विष्णुतीर्थेकृतस्नानो यो मां विष्णुं विलोकयेत् । विश्वेशाद्दक्षिणे पर्श्वे विष्णुलोकम् स गच्छती ।। गुरु चरित्र के ४२ वें अध्याय में पंचक्रोशी यात्रा के अंतर्गत विष्णु का नाम आया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत काशी रहस्य के १० वे अध्याय में भी इसका वर्णन आया है। जिसमे काशी की नित्य यात्रा में इनका दर्शन होता है। इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया तथा विग्रहों को छैनी ओर हथोड़े के द्वारा निकाला गया जिसे वर्तमान मे कहाँ रक्खा गया है, पूजन इत्यादि हो रहा है या नहीं, विग्रह सुरक्षति भी हैं या नहीं इसकी कोई सूचना नहीं है। कुछ सरकारी लोगों का कहना है, कि सभी विग्रह सुरक्षित हैं, कितु उन्होंने प्रमाण के रूप मे कुछ नहीं दिखाया है, तो वस्तुस्थिति क्या है, ये कहना अत्यंत कठिन है।



शिव कचहरी शिव कचहरी एवं बाबा दरबार की मान्यता थी कि जो लोग मुकदमे में फंस जाते थे। वे लोग इस शिव कचहरी में अपनी इच्छा लेकर आते थे। जिससे उनके पक्ष में मुकदमे का फैसला आता था इस शिव कचहरी में १०८ शिवलिंग के अलावा सभी देवताओं की प्रतिमा भी थी।

यहां नित्य पूजन पाठ भी किया जाता था। यहां बाबा धर्मराज के रूप में विराजते थे यहां महेश्वर जी, कपिल मुनि, अक्षय वट, हनुमान जी राम दरबार, अक्षय वट वृक्ष में नकुलीश्वर, देवयानीश्वर, द्रुपदादित्य, द्रोपदी, द्रोपदी कूप, द्रुपदेश्वर तथा द्रुपद विनायक थे।



इन सभी विग्रहों को अत्यंत निंदनीय ढंग से वहाँ से निकाल गया, जिन्हे बाद मे स्वामी श्रीअविमुक्तेश्वरानन्द जी ने अपने संरक्षण मे लिया। काशी खण्ड मे तो यहाँ तक कहा गए है की खण्डित शिवलिंग भी काशी में पूजनीय है। काशी खण्ड स्पष्ट कहता है कि दुरवस्था में पड़े और समय के फेर से टूट फूट गये शिवलिंग भी सर्वथा पूजनीय हैं। प्रतिष्ठितानियानीहमुक्तिहेतूनितान्यपि। अदृश्यान्यपिदृश्यानि दूरवस्थान्यपि प्रिये।। भग्नान्यपिचकालेनतानिपूज्यानिसुन्दरि। परार्धशतसंख्यानिगणितान्येकदामया। – स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, अध्याय 72, श्लोक संख्या 24/25.

किन्तु यहाँ तो इन्होंने स्थापित और शास्त्रोक्त विधि से पूजित विग्रहों की इस प्रकार का दुर्दशा किया जिसका चिंतन करने पर क्रोध और भावुकता से मन भर जाता है। काशी खण्ड 64/62 के अनुसार काशी के सभी शिवलिंग विश्वनाथ जी के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित हैं। ताकि एक ही स्थान पर सारे भक्त एकत्र हो अव्यवस्था न उत्पन्न करें। यथा – तव प्रतिनिधीकृत्या- स्मामिस्त्वद्भक्तिभावितैः। प्रतिष्ठतेषु लिंगेषु सान्निध्यं भवतोस्त्विह।। काशीखण्ड 33/168-173 के अनुसार काशी के सभी शिवलिंग विश्वनाथ जी के शरीर के अंग हैं।

जैसे ऊंकारेश्वर शिखा, त्रिलोचन आंखें, गोकर्णेश्वर और भारभूतेश्वर कान, विश्वेश्वर अविमुक्तेश्वर दाहिने हाथ, धर्मेश्वर तथा मणिकर्णिकेश्वर बायें हाथ, कालेश्वर और कपर्देश्वर चरण, ज्येष्ठेश्वर नितम्ब, मध्यमेश्वर नाभि, महादेव जटायें, चन्द्रेश्वर हृदय, वीरेश्वर आत्मा हैं।

अब ये मै आपके विवेक पर छोड़ता हूँ की इसे आप सनातन मानबिंदुओं का विनाश नहीं मानेंगे तो और क्या मानेंगे? अरे विकास का पक्षधर कौन नहीं होगा? पर विकास के नामपर ये जो विनाश किया गया क्या वो सब देख कर भी हम किसी एक व्यक्ति, एक पार्टी, और एक विचारधारा की चाटुकारिता करते हुए मौन रहें?

जो अपने आपको सनातनी कहते हैं, उन्हे ये निश्चित करना होगा की उनके लिए उनके शास्त्र उनके देवता उनके मानबिन्दु अधिक महत्वपूर्ण हैं या कोई व्यक्ति, कोई पार्टी, अथवा कोई विचारधारा महत्वपूर्ण है? मेरे लिए तो इसका चयन करना बहुत साधारण सी बात है प्राण जब तक है तब तक मेरे लिए मेरे शास्त्र मेरे धर्म से बढ़कर कोई नहीं हो सकता!


अक्षय वट जिसका पौराणिक महत्त्व अत्यंत उत्कृष्ट था तथा काशी के लोगो के श्रद्धा का केंद्र था उसे भी इतनी निर्ममता के साथ तोड़ा गया की मेरे नेत्रों से अश्रुधारा निकल आया, कोई भी सनातनी इसे देख कर भावुक हो जायेगा। दूसरा अक्षय वट उखाड़े जाने के पूर्व और पहला उखाड़े जाने के बाद का चित्र है।

काशी की जो अनंत अनंत विशेषताएं उसमे सबसे महत्वपूर्ण जो बात है, वो है पतित पावनी माँ गंगा का अर्ध चंद्राकार स्वरूप कहा जाता है, कि माँ गंगा ने स्वयं विश्वनाथ के चरणो का प्रक्षालन करने के लिए इस प्रकार का स्वरूप लिया है। काशी में गंगा अर्ध चंद्रकार स्वरूप में प्रवाहमान हैं। इससे सामने घाट से असि घाट तक तीव्र धारा टकराकर दशाश्वमेध की ओर घूमती है। आगे भी घाटों से टकराते हुए मणिकर्णिका घाट से घूमकर राजघाट की ओर निकलती है। उस स्वरूप को भी विकृत करने का प्रयत्न करते हुए हजारों टाली मलबा माता के गर्भ मे गिरकर कॉनक्रीट के द्वारा ढलवाया जा रहा है।

हमारी मांगे क्या हैं?

हमारी मांगे हैं कि पंचायतन मंदिरों सहित जितने भी पौराणिक महत्व के मंदिर थे उन सभी को यथा स्थान (कहीं और नहीं जहां उनका स्थान था वहीं पर) उनको पुनः प्रतिष्ठित किया जाए! संपूर्ण भारत से शास्त्रज्ञो और वेदज्ञो को बुलाकर किए गए क्रूरता पूर्ण विध्वंस का प्रायश्चित किया जाए तथा वैदिक विधि विधान से मंत्र बल द्वारा पुनः उस स्थान को उद्दीप्त किया जाए। काशी क्षेत्र भगवान आद्यशंकराचार्यजी के द्वारा स्थापित गोवर्द्धन मठ पूरी पीठ के अंतर्गत आता है। उस मठ के वर्तमान जगद्गुरू शंकाराचार्य जी के पद पर प्रतिष्ठित पूज्यपाद के मार्गदर्शन में ये सारे कार्य संपन्न हों ऐसी सनातन मनबिंदुओं में विश्वास रखने वाले हम सनातनियों की मांग है, धार्मिक क्षेत्र के सर्वोच्च न्यायाधीश होने के कारण पूज्य पाद जगदगुरुजी के द्वारा जो मार्ग प्रशस्त किया जाएगा हम उसके पक्षधर होंगे।


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