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ज्ञानवापी इस्लामिक कट्टरपंथियों की बर्बरता का ऐतिहासिक सच, सरकारों की उदासीनता का दंश झेलनें को मजबूर सनातनी समाज, खैर चुप रहने की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी सनातनियों।

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वाराणसी। श्रृंगार गौरी और ज्ञानवापी मस्जिद मामले में सर्वे और वीडियोग्राफी के विवाद ने क़ई पुराने मामलों को जन्म दे दिया है। उन सभी मान्यताओं और अवधारणाओ पर बहस छिड़ चुकी हैं, जिसमें हमेशा यह दावा किया जाता रहा है कि मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ था। काशी विश्वनाथ मंदिर और उससे लगी ज्ञानवापी मस्जिद, दोनों के निर्माण और पुनर्निमाण को लेकर कई तरह की धारणाएँ हैं। लेकिन स्पष्ट और पुख़्ता ऐतिहासिक जानकारी काफ़ी कम है और दावों- क़िस्सों की भरमार ज़रूर है।

मोहम्मद गौरी ने किया था बनारस पर पहला हमला

इस पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास से लेकर उसके आक्रमण तक के बारे में आखिरी सच से बातचीत की। उन्होंने बताया कि काशी विश्वनाथ मंदिर सनातनियों के लिए सबसे पवित्रतम स्थान है। अनादिकाल से चल रहा काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण के समय भी विद्वमान था और इसीलिए काशी की महता बढ़ी। लेकिन जबसे मुस्लिम आक्रमणकारियों का हमला शुरू हुआ, तब इस्लाम का क्रूर चेहरा नज़र आया। सबसे पहले 1194 में मोहम्मद गौरी ने बनारस पर हमला किया। इस दौरान बनारस के 500 मंदिरों को तोड़ा गया। काशी विश्वनाथ मन्दिर को भी क्षति पहुचाई गयी थी।

काशी विश्वनाथ मंदिर में थी अकूत संपत्ति

उस समय यह कहा जाता था कि काशी विश्वनाथ मंदिर और अन्य मंदिरों से इतनी अकूत धन संपति मिली कि मोहम्मद ग़ोरी 1400 ऊंट पर लादकर के उसको गजनी ले गया था। उसके बाद जौनपुर के शासक महमूद शाह ने हमला किया था। काशी विश्वनाथ मंदिर पर शाहजहां ने भी हमला किया था। काशी पर इन सबमे सबसे क्रूरतम हमला इस्लाम के चेहरे के रूप में औरंगजेब ने किया था। औरंगजेब ने सबसे पहले अप्रैल 1669 में गवर्नर अबुल हसन को यह हुकुम दिया कि किसी भी कीमत पर काशी विश्वनाथ मंदिर को पुरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया जाए‌। इसका जिक्र साकिब खा ने यासिर आलम गिरी पुस्तक में किया है, और ये बताया कि अगस्त 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर को पुरी तरह से तोड़ दिया गया था।



औरंगजेब वें बनवाया था मस्जिद

मंदिर के स्थान पर औंरगजेब ने मस्जिद का निर्माण करा दिया जो आज तक है। वो काशी विश्वनाथ मंदिर का मूल भाग हैं, इसीलिए नन्दी का मुख ज्ञानवापी मस्जिद की तरफ़ है। दूसरी बात पुरी दुनिया में जितने भी मस्जिद बने हैं, किसी का भी नाम संस्कृत में नहीं है। मगर इसका नाम संस्कृत में है ज्ञानवापी। ज्ञान का मतलब ज्ञान वापी मतलब कुंआ। प्रोफेसर डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि बात यदि वहां मस्जिद था, तो चाहे कोई भी शासक हो मन्दिर के बगल में मस्जिद का निर्माण क्यों किया। कुतुबमीनार समेत मथुरा, अयोध्या तक मे मंदिरों को तोड़कर ही मस्जिद बनाया है, लेकिन सबसे घृणित कार्य औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ किया था।

जब कोर्ट ने यह आदेश दे दिया था कि सर्वे वीडियोग्राफी कराई जाएगी तो प्रतिवादी पक्ष को क्या आपत्ति है। जिसे भी आपत्ति है उस पर रासुका लगाकर के जेल भेज देना चाहिए। अदालत के आदेश की अवहेलना करने पर हिन्दू- मुस्लिम दंगा भड़काने पर, हिंदुओ के पवित्रतम स्थान पर भावना भड़काने पर इनको जेल भेज देना चाहिए। ये सभी इस्लाम के नाम पर झूठ बोल रहे हैं। प्रोफेसर डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि दुनिया में कही भी देख लीजिए चाहे वो मक्का मदीना हो, ईसाईयों का वेटिकन सिटी हो, सीखो का अमृतसर हो किसी भी धर्म में दूसरे धर्म के लिए जगह नहीं है, तो फिर काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में मस्जिद क्यों बनाई गई थी।

सुभाषपा बनीं पहली पार्टी जिसने न दिया बयान

एक ओर जहां कोई भी राजनैतिक दल इस मुद्दे पर वोट बैंक ने खिसकनें पाते की डर से कोई बयान नहीं दे रहें हैं वहीं दो दिन पहले समाजवादी पार्टी की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता शशी प्रताप सिंह ने एक बयान जारी करके सबको चौंका दिया। प्रदेश प्रवक्ता ने बाकायदा वीडियो संदेश जारी कर मुस्लिम समाज से ज्ञानवापी मस्जिद को हिंदू पक्ष को सौंप देने की अपील की है। अपने बयान में प्रदेश प्रवक्ता ने ये भी कहा कि इसके बाद काशी विश्वनाथ धाम का स्वरूप और भी भव्य हो जाएगा। कुछ दिनों पहले ही ओपी राजभर की परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह से मुलाकात हुई थी। इसके बाद उनके भाजपा में जाने की चर्चाएं तेज हो गई थी। अब राजभर की पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता शशि प्रताप सिंह ने ज्ञानवापी मामले में बयान देकर इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। दरअसल श्रृंगार गौरी नियमित दर्शन पूजन को लेकर वाराणसी के सिविल जज के आदेश पर सर्वे का कार्य कराया जा रहा है। लेकिन मुस्लिम पक्ष के लोग इस सर्वे का लगातार विरोध कर रहे हैं। किसी भी राजनीतिक दल की ओर महौल को देखते हुए कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जा रही है। लेकिन राजभर के पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता की ओर से मुस्लिम पक्ष के लोगों से अपील की गई कि वो मस्जिद पर अपना दावा छोड़ दें।



क्या कहा सुभाषपा प्रदेश प्रवक्ता नें?

सुभासपा प्रदेश प्रवक्ता शशिप्रताप सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वाराणसी के बाबा विश्वनाथ मंदिर के बगल में बना हुआ ज्ञानवापी मस्जिद वास्तव में कभी मंदिर था। इस मस्जिद को ध्यान से देखें तो लगता है कि किसी जमाने में मंदिर का ऊपरी हिस्सा को तोड़कर मस्जिद का ढांचा बनाया गया है। इस मंदिर के बारे में पूर्वजों का कहना है कि मंदिर के अंदर श्रृंगार गौरी माता का मूर्ति स्थापित थी। शायद आज भी ज्ञानवापी में वह मूर्ति स्थापित है। बाहरी दीवार देखेंने से तो शुद्ध रूप से वह मंदिर का ही डिजाइन दिखाई देता है।

सुप्रीम कोर्ट से अपील है कि हस्ताक्षेप करें

शशिप्रताप सिंह ने कहा कि मेरी सुप्रीम कोर्ट से अपील है, कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप कर हिंदुओं की आस्था को ध्यान में रखते हुए मां श्रृंगार गौरी के मंदिर को हिंदुओं के हाथ में देने की प्रक्रिया शुरू करें। उन्होंने कहा कि बनारस शहर में अनगिनत मस्जिद है। ज्ञानवापी मस्जिद के लिए मुस्लिम पक्ष को कहीं और प्रदेश सरकार को जमीन देना चाहिए। बनारस पूरे दुनिया में गंगा जमुना तहजीब और राम रहीम सद्भावना भाईचारा के नाम पर प्रसिद्ध है। दोनों समाज के आस्था को ध्यान में रखते हुए सही फैसला कोर्ट करें। मुसलमान भाइयों को जिद छोड़ कर उस मस्जिद के प्रांगण को हिंदू भाइयों को दे देना चाहिए, जिससे बाबा का दरबार को और भी व्यवस्थित और भव्य बनाया जा सके।

हम आपको दिखातें हैं ज्ञानवापी का सच

ज्ञानवापी- वाराणसी के ज़िला न्यायालय ने शृंगार गौरी विवाद में ज्ञानवापी मस्जिद की वीडियोग्राफी और फ़ोटोग्राफी लिए एक टीम गठित की थी जिन्हें 6 व 7 मई को विवादित परिसर में जाकर वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण का कार्य करना था।तब मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि वे लोग अदालत द्वारा नियुक्त की गई सर्वे टीम को मस्जिद में घुसने नहीं देंगे और आखिरकार मुस्लिम पक्ष ने टीम को मस्जिद के अंदर नहीं दिया। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी (जो कि मस्जिद की व्यवस्था देखती है) के सचिव एस एम यासीन खुलेआम कह रहा है कि वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण के लिए किसी को मस्जिद के अंदर घुसने नहीं देंगे। हिन्दू लोग शृंगार गौरी के बहाने ज्ञानवापी मस्जिद में घुसना चाहते हैं।

ऐसा नहीं है कि विवादित परिसर का सर्वेक्षण पहली बार हो रहा है। 1937 में बनारस के तत्कालीन सिविल जज एस बी सिंह ने एक नहीं बल्कि दो बार मस्जिद परिसर और आस पास का स्वयं निरीक्षण किया था। पहली बार सम्बन्धित मुक़दमे की सुनवाई से पहले और दूसरा निरीक्षण फ़ैसला सुनाने के पूर्व किया गया था। उसी मुक़दमे में अंग्रेज़ी सरकार ने दो विशेषज्ञों इतिहासकार डॉ परमात्मा सरन और इतिहासकार डॉ ए एस अल्टेकर को अदालत में गवाह के तौर पर प्रस्तुत किया था। इन दोनों ने भी ज्ञानवापी मस्जिद परिसर, मस्जिद के नीचे स्थित तहख़ाने और पश्चिमी दीवार में प्राचीन मन्दिर के भग्नावशेषों का विस्तार से सर्वेक्षण और अध्ययन किया था। इन दोनों इतिहासकारों की गवाही पर आपत्ति जताते हुए मुस्लिम पक्ष ने अदालत से कहा था कि यदि विशेषज्ञों की आवश्यकता है तो सरकार की बजाय अदालत अपनी तरफ़ से विशेषज्ञों को नियुक्त कर सकती है। उस समय यह स्वीकार्य था, तो आज अदालत द्वारा नियुक्त सर्वे टीम पर आपत्ति क्यों की जा रही है?



एस एम यासीन कह रहा है कि बैरिकेडिंग के अन्दर सर्वेक्षण करने के लिए हम किसी को घुसने नहीं देंगे। अरे जनाब जिस बैरिकेडिंग की बात कर रहे हो वो बैरिकेडिंग तो 90 के दशक में वहाँ डाली गई है। बैरिकेडिंग के अन्दर मस्जिद की पश्चिमी दीवार जिसमें प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष हैं, के ही एक भाग में शृंगार गौरी की पूजा की जाती है। वह हिस्सा कुछ ही दिनों पहले बैरिकेडिंग से बाहर किया गया है। इस विवाद का निपटारा बिना भग्नावशेषों के सर्वेक्षण के नहीं हो सकता। इसीलिए अदालत का आदेश बैरिकेडिंग के अन्दर या बाहर का नहीं बल्कि आराजी संख्या 9130 के सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी का है। इस आराजी संख्या के अन्तर्गत जो कुछ भी स्थित है, उसका सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी की जानी है। अदालत  में तो आप यह कहते हो कि मस्जिद में किसी को केवल ग़ैर मुस्लिम होने के आधार पर जाने से नहीं रोका जा सकता लेकिन अब अदालत के बाहर चैनलों पर कह रहे हो कि मस्जिद के अंदर मुसलमानों और सुरक्षाकर्मियों के अतिरिक्त कोई नहीं जा सकता। हम अदालत के आदेश पर गठित टीम को भी मस्जिद के अंदर घुसने नहीं देंगे।

सवाल ये है कि देश संविधान के आलोक में अदालत के निर्णयों से चलेगा या फिर एस एम यासीन की गुंडई से चलेगा। भड़काऊ बयानों से देश का वातावरण बिगाड़ने और अदालत की अवमानना के लिए एस एम यासीन को तत्काल गिरफ़्तार कर जेल भेजा जाना चाहिए। साथ ही राज्य सरकार, ज़िला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन को हीलाहवाली करने की बजाय सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था करते हुए सर्वेक्षण कराना चाहिए था।


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