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क्या कृतिम आंख अंधेपन में सहायक होता है?- डॉ सुमित्रा अग्रवाल

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कृतिम आंख हालांकि वही लोग लगाते है जिनकी एक आंख नष्ट हो गयी है, परन्तु इससे दिखाई नहीं देता है। कृतिम आंख लगाने के कई कारण है सामाजिक, व्यक्तिगत, मेडिकल और भावनात्मक।

सामाजिक दृष्टिकोण से एक आंख ख़राब होने से सामाजिक गतिविधिया हीन भाव के कारण कम हो जाती है। सोचिये की कोई ऊंचे पद के लिए इंटरव्यू देने गए है जैसे की कंपनी का सीइओ तो क्या जिनकी एक आंख नष्ट हो गयी है, उन्हें वो जॉब मिलेगा। ऐसे कई पक्ष है जिसमे विकलांगता के कारण कई चीजों में पिछड़ना पड़ता है।

व्यक्तिगत दृष्टिकोण से जब चेहरे पर एक छोटी सी फुंसी भी हो जाती है तो किसी से मिलने, बात करने, बाहर जाने, किसी जलसा या कार्यक्रम में भाग लेने से कतराते है। आंख ख़राब होने से नजरे मिलाकर बात करना या सार्वजनिक उत्सव का अंग बनना चाहते हुए भी संभव नहीं हो पता हैं।



भावनात्मक दृष्टिकोण से स्कूल, कॉलेज जाना, ट्यूशन जाना, मार्केटिंग की नौकरी करना, या फ्रंट डेस्क की नौकरी करना अत्यंत दुखदायी होता है । यह पीड़ा सिर्फ वो व्यक्ति समझ पाता है जो इस तरीके की विकलांग अवस्था से जूझ रहा हो।

इस हीन भावना को दूर करने के लिए या इस हीन भावना से निकलने के लिए उनकी एक इच्छा हमेशा रहती है कि वो नॉर्मल व्यक्ति की तरह दिखे, इसलिए वो कृतिम आंख बनवाते हैं, ताकि लोगों को न पता चले कि उनकी एक आँख ख़राब है। वो कभी किसी को ये नहीं बताते है कि उन्हें उस आंख से दिखाई नहीं देता है।

कृतिम आंख लगाने के पीछे मेडिकल कारण भी है। चेहरे की बनावट को ठीक रखना भी जरुरी है। मैंने अपने २२ वर्ष के अनुभव से देखा जिनकी आंखे बचपन में नष्ट हो गयी थी या जो जन्मगत एक आंख के साथ जन्मे हैं, वे अगर लम्बे समय तक कृतिम आंख नहीं लगाते है, तो जगह छोटी होने लगती है, एक समय के बाद न केवल ऊपर की चमड़ी और पालक चिपकने लगते है, आंख के अंदर की जगह में भी मांस विकसित होने लगता है, ख़राब तरफ के चेहरे का वह भाग अंदर की तरफ धसने लगता है, चेहरे की आकृति बिगड़ने लगती है। इसलिए भी कृतिम आंख लगाना जरुरी हो जाता है।


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