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मायस्थेनिआ ग्रेविस से पीड़ित अरुण बाली का निधन, फिल्म इंडस्ट्री को धक्का- डॉ सुमित्रा अग्रवाल

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मैंने मेडिकल की किताबो में पढ़ा था कि मायस्थेनिआ ग्रेविस एक रेयर बीमारी है। परन्तु विगत १० वर्षो में मैंने देखा की इस बीमारी के मरीज़ो की संख्या एकाएक काफी बढ़ गयी है। और एक रोचक बात मैंने देखी की कम उम्र के लोगो में भी ये बीमारी तेजी से बढ़ती जा रही है।

अपने ही परिवार में मुझे मायस्थेनिआ के मरीज़ के साथ रहने का भी मौका मिला। पहले की अपेक्षा विगत १० वर्षो में मैंने मयिस्थेनिआ को करीब से देखा और इन मरीज़ो के साथ काम करते- करते मैंने कुछ तथ्य को जाना जो आज आपसे साझा करुँगी।

मायस्थेनिआ ग्रेविस का शाब्दिक अर्थ है मास पेसियो की करुण अवस्था अर्थात माँस पेसियाँ बहुत ही कमजोर और दुर्बल हो कर कार्य नहीं कर पाती है। मायस्थेनिआ कई प्रकार का होता है। क्यों की मैं आँखों से जुडी हुई हूँ तो मेरे रोज मर्रा के रोगियों में मैं आँखों से जुडी मायस्थेनिआ के मरीज़ो से मिलती रहती हूँ। आँखों के मायस्थेनिआ में पलकों की मास पेसिया इतनी दुर्बल हो जाती है की रोगी आंख को खुला नहीं रख पता है। पलके बंद सी हो जाती है। इस बीमारी को ऑक्युलर मायस्थेनिआ या टोसिस बोलते है।

पलकों का झपकना क्यों जरुरी है

पलकों का झपकना हमारी आँखों के लिए अत्यंत आवश्यक है। जब हम पलक झपकते है उस समय एक साथ बहुत सी क्रियाएँ होती है। एक तरफ आँखों की सफाई हो जाती है तो दूसरी तरफ आँखों को एक पल का विश्राम भी मिलता है। हम एक मिनट में १०- २० बार पालक झपकते है। कुछ महत्वपूर्ण दृश्य देखते समय हमारी पलके कम झपकती हैं। विदेशी सिनेमाकार अपनी फिल्मो की एडिटिंग में फ्रेम चेंज हमारे पलकों के झपकने को ध्यान में रख कर करते हैं, ऐसा करना ही विदेशी फिल्मो को सामान्य स्तर से ऊपर उठता है।

टोसिस के लक्षण

इसमें रोगी की पलके पूर्ण रूप से खुलती नहीं है। कई लोगो की पलके झुकी हुई ही रह जाती है। पहले जन्मगत टोसिस ही ज्यादा देखने को मिलते थे, पर आज कल टोसिस हर उम्र के लोगो में पाया जाने लगा हैं। स्त्री और पुरुष सामान्य रूप से पीड़ित हैं, देश या जाति से सम्बन्ध नहीं पाए गए है।

टोसिस के प्रकार

टोसिस को हम दो भागो में बाट सकते हैं – एक जन्मगत और दूसरा अक्वायर्ड अर्थात जन्म के बाद कभी भी पलकों का झुक जाना।

किन लक्षणों से जाने की क्या टोसिस समस्या हैं?

अगर किसी को एक आंख में टोसिस होता हैं तो एक आंख छोटी और एक बड़ी दिखेगी, झुकी हुई पलकों में पलकों के ऊपर का क्रीज़ नहीं मिलेगा, कई बार अगर पलक ज्यादा नीचे आ जाती हैं तो देखने में भी दिक्कत आती हैं, और तो और रोगी अंगुलियों से पलकों को ऊपर कर के देखने की कोसिस करता हैं, गर्दन उठा के रखता हैं, भौंह को भी ऊपर की तरफ खींचता हैं जिससे की उसकी पलके उठ जाये और देखने में दिक्कत न आये।



मेरे स्वानुभव

आज के समय में इसके बढ़ने का कारण सबसे प्रमुख मायस्थेनिआ है और इसके अलावा मानसिक चाप, अनियंत्रित खान पान, डायबिटीज, ब्रेन स्ट्रोक, ब्रेन टूमर, थर्ड नर्व की पैरालिसिस, चोट लगना, किसी ऑय सर्जरी के बाद जैसे की कैटरेक्ट सर्जरी या लेसिक सर्जरी के बाद, बहुत से मेडिसिन के साइड इफ़ेक्ट से भी टोसिस के रोगियों की संख्या बढ रही है। बढ़ते उम्र के साथ टोसिस होना स्वाभाविक है। परन्तु आज का मानव अपने मानसिक परेशानियों से परेशान हो कर कई प्रकार की न्यूरोलॉजिकल दवाये लेने लगा हैं, इन दवाओ का असर हमारे पलकों के मसल्स और नर्व पे होता हैं। और बहुत से मिर्गी, एपिलेप्सी, ओस्टीओ आर्थराइटिस के रोगियों की पैन किलर दवाओं के साइड इफेक्ट्स से भी टोसिस होने की सम्भावनाये है। आज कल एक नया चलन आया हैं मूड स्टेबलाइजर का, इसमें आम तोर पे युवा वर्ग अपने मूड को स्टैबिलाइज करने के लिए दवाओ का सहारा लेते हैं, इन दवाओं के साइड इफेक्ट्स से भी टोसिस हो सकता है।

दर्द में पैन किलर का सेवन एक आम बात है।

मॉर्फिन जाती की पैन किलर का सेवन समझ बूझ के किया जाना चाहिये। तुरंत आराम के लिए बहुत प्रकार की दवाओ का कॉकटेल बाजार में उपलब्ध हैं, इन दवाओ के सेवन से बचे, हमेशा चिकित्सक की सलाह से ही दवाओ का सेवन करे, जहा तक संभव हो अनायाश दवाओं के सेवन से बचे। कई बार देखा गया हैं पलकों का झुका होना रोगी को देखने मे कोई समस्या नहीं देता है परन्तु एक हीन भाव से वो ग्रषित हो जाता हैं। मैंने अनुभव से जाना की छोटे बच्चों में टोसिस होने से उनको स्कूल में, दोस्तों के बीच कई बार शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है, कई बार बात यहाँ तक पहुंच जाती है, कि बच्चा स्कूल ही जाना छोड़ देता है, और पढ़ाई तक बंद हो जाती है, सामाजिक अनुष्ठान में भी नहीं जाता है।

कई बार एक पलक का ज्यादा झुका होना व्यक्ति के चरित्र पर भी सवालिया निशान खड़ा कर देता है, और तो और मैंने एक महिला टोसिस के मरीज से जाना की उसकी दोनों पलके झुकी होने के कारण उसे समाज में ना अच्छे नजर से देखा गया न ही प्रतिभा को देखा गया बल्कि उनके आते ही लोगो ने उन्हें ओवर ड्रिंक की संज्ञा दी, काफी लोग उनका उपहास भी करते है, ये कह कर की सुबह सुबह ही नशे में डूबी हुए है। हमारा समाज एक रोगी या एक विकलांग को तभी सहानभूति दिखाता है जब वो अपने ऊपर अपने बीमारी का टैग लगा के घूमता है वार्ना उसे उपहास का ही सामना करना पड़ता है।

टोसिस का इलाज

टोसिस की चिकित्सा की बात करे तो ऑपरेशन कर के पलकों को ऊपर उठाया जाता है। कई बार देखा गया है ये सर्जरी सक्सेसफुल नहीं भी होती है, या तो पलक ज्यादा उठ जाता है, या कम, कई बार कुछ समय के बाद वापस टोसिस हो जाता है, सर्जरी के बाद पलकों के ऊपर टांको के निशान भी देखने को मिलते है। कुल मिला के ऑपरेशन एक अच्छा विकल्प नहीं है। टोसिस के कुछ नॉन सर्जिकल उपाय भी है। भोजन, ऑय एक्सरसाइज और स्पेशल तरह का चस्मा लाभ दायक है।

जन्मगत टोसिस के रोगियों के पास सिर्फ दो ही विकल्प है, ऑपरेशन या बिना सर्जरी के क्रच वाला चस्मा जो पलकों को उठा के रख। जन्म के बाद होने वाले टोसिस में कारण को पहले जानने से इलाज में मदद मिलती हे। आम तौर से विटामिन बी, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, विटामिन सी, विटामिन इ, टौरीन, लेसिथिन, एसेंशियल फैटी एसिड्स पाए जाने वाले फल, सब्जियों का सेवन या इनके टेबलेट्स का सेवन ना केवल पलकों को नूट्रिशन देता है, बल्कि आँखों के लिए भी विशेस लाभदायक है। आँखों की एक्सरसाइज भी पलकों के मसल्स को ताकत देता है जैसे की इंडेक्स फिंगर को ऑय ब्रो पे रखे और हलके से निचे की तरफ प्रेस करे और इसी समय अपने भौवों को ऊपर की तरफ खींचे, फिर आंखे बंद कर ले और इंडेक्स फिंगर से पलकों को ऊपर की तरफ खींचने की कोसिस करें और उसी समय आँखों को दबायें रखे की पलके ना खुले अर्थात दो अलग दिशा में फाॅर्स को लगाए उंगलिया पलक खोलना चाहेंगी और आप बंध रखना चाहेंगे इस से पालक के मांसपेशियो पे एक दबाव बनेगा। इस के बाद आंख खोले और जोर से बांध करे ऐसा ४ से ५ बार करने क बाद ६ सेकंड आंख बांध रखे, ऐसा कई बार करे, आंखे खोले और आँखों को नीचे ऊपर की ओर आवाजाही करे १० बार ऐसा रोज करे, दिन में कई बार करे। इमीडियेट सोल्युशन के लिए टोसिस का क्रच वाला चस्मा बनाये जो आपकी पलकों को उठा के रखेगा और सामने से देखने वालो को पता भी नहीं चलेगा की आपकी पलकों में कोई समस्या है ।

मायस्थेनिआ में क्या मृत्यु संभव है।

अगर मायस्थेनिआ सिर्फ आँखों की माँसपेसियों तक सिमित है, तब मृत्यु का कारण नहीं बनता है, परन्तु अगर मायस्थेनिआ शरीर के मसल्स को आक्रांत करता है, तब सांस के रुकने से मृत्यु संभव है। आमतौर पर मायस्थेनिआ में सास रुक जाती है क्योंकि डायाफ्राम जो की नीचे ऊपर होता है। हमारे सास लेते छोड़ते समय, वो एक मास पेसी ही है और इतना कमजोर हो जाता है कि निष्क्रिय हो जाता है, और एक समय अचानक नीचे नहीं होता है, और सास की आवा जाई रुक जाती है, ऐसा ही कुछ हाल ही में अरुण बाली जी के साथ हुआ।

हर मायस्थेनिआ ग्रेविस के मरीज़ को हार्ट मसल्स और रेस्पिरेटरी मसल्स को स्ट्रांग करने की दवा लेनी चाहिए।


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